
•गाय को गुण्डों के रूप में क्यों देख रहे हो? बचपन में सींग मार दी इसलिए, या फिर बुद्धिजीवी बनने का शौक़ है?
•गाय के लिए आधार कार्ड: हेडलाइन में गाय और आधार देखकर कूदो मत
•दैनिक खोज़ ख़बर अतिथि सम्पादक अजीत भारती जी की क़लम से…...गाय को इस देश में ऐसे देखा जाने लगा है मानो वो जानवर नहीं आतंकवादी हों। गाय की टैगिंग जब से मैं पैदा हुआ हूँ, तब से देख रहा हूँ। कान में एक पीले रंग का प्लास्टिक टैग लगा रहता है कई गायों में। इससे उनकी ब्रीड, शारीरिक माप, इन्श्योरेन्स आदि जैसी बातें पता चलती हैं। और हाँ, दुनिया के कई विकसित देशों में, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूरोपियन यूनियन सहित, जानवरों के पहचानपत्र बनते हैं, ताकि उनकी जानकारी सरकार के पास हो और उनके लिए नीतियाँ बनाई जाएँ।
ये टैग नीले, पीले रंग के प्लास्टिक वाले, आरएफआईडी वाले इलेक्ट्रानिक, बटन की आकार वाले होते हैं। मतलब ये है कि ये हर जगह हो रहा है 1913 से ही, कोई नई बात नहीं है। भारत थोड़ी देर से जगा है।
ज्ञानियों को शायद पता ना हो पर इस देश में भी हर जानवर की, चाहे पालतू हों या जंगली, गिनती होती रही है। जनसंख्या के समय भी हर घर से इनके बारे में जानकारी वैसे ही ली जाती है, जैसे लोगों की। सरकारों को मालूम होता है कि किस राज्य में, किस जिले में, किस गाँव में, किस घर में कितनी गाएँ हैं। चूँकि ये काम हर दस साल में होता है, तो ज़ाहिर है ये संख्या भी वैसी ही होती है।
अब सरकार ने गायों को आधार कार्ड देने का फ़ैसला किया है। इसमें गाय किसकी है, उसका रंग, ब्रीड, ऊँचाई, सींग का प्रकार, पूँछ आदि का आँकड़ा होगा ताकि उसकी पहचान की जा सके। गाय से तात्पर्य गाय, बैल, बछड़े, और साँड से है। कारण बताया गया कि इनकी स्मग्लिंग होती है और किसी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जाता क्योंकि पता नहीं होता कि कौन बेच रहा है। अगर आपको इनके स्मग्लिंग, हत्या आदि से प्रेम है, तो फिर आगे मत पढ़िए। हम उस दौर में हैं जब सड़क के कुत्ते को कोई पत्थर मारता है तो वो ख़बर बन जाती है, लेकिन चूँकि गाय हिन्दुओं द्वारा पूज्य है, तो उसकी बात करना भी साम्प्रदायिक है।
एक मिनट के लिए गाय और हिन्दू को अलग कर लीजिए। अपने घर जाईए और देखिए कि दूध कहाँ से आता है आपका। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि दूध मदर डेयरी के फैक्ट्री में नहीं बनती, वो गाय के थनों से आती है। आपका आइसक्रीम, दही, लस्सी, छाछ सब गाय के थनों से ही आते हैं।
एक तर्क ये आता है कि सरकार को लोगों की चिंता नहीं है, गायों की बहुत चिंता है। क्यों ना हो? और लोगों की चिंता कैसे नहीं है? क्या सरकारें नीतियाँ नहीं बना रहीं? आप कहेंगे कि नीतियाँ ही बना रही है, उस पर काम नहीं हो रहा। यूँ तो ऐसा मानना गलत है, लेकिन फिर भी मैं मान लेता हूँ कि सरकार सिर्फ नीतियाँ ही बना रही है। तो फिर गाय पर भी नीति बन जाए, आपको क्या कष्ट है? गाय को गुण्डों के रूप में क्यों देख रहे हो? बचपन में सींग मार दी इसलिए, या फिर बुद्धिजीवी बनने का शौक़ है?
गाय तुम्हारे जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा है, रहेगी। तुम मानो, या ना मानो। हद तो ये है कि जो लोग पालतू कुत्ते और बिल्ली को लेकर इमोशनल हो जाते हैं, उनको भी गायों से दिक़्क़त है। ये क्या बात हुई? ज़िंदगी में कभी गाय को क़रीब से देखा भी है? या कारों से जाते वक़्त सिर्फ गाली दी है कि सड़कों पर घूमते हुए तुम्हारी यात्रा में बाधक होती है। आधार बन जाएगा तो सड़कों पर घूमना भी बंद हो जाएगा क्योंकि सरकार ने वार्ड लेवल तक इसके इंतज़ाम करने की बात की है।
तुम वही मानना चाहते हो, जो तुम्हारे दिमाग़ में है। तुम सिर्फ आधार और गाय को पकड़ कर बैठ जाते हो। एक ही बात में एक तर्क होता है कि जनता ग़रीबी से मर रही है, और इन्हें गाय को आधार देना सूझ रहा है। दूसरा तर्क फिर उसी बात के लिए, दूसरी जगह, ये होता है कि गायों के लिए सरकार कुछ करती नहीं, बस गौरक्षकों को बढ़ावा दे रही है।
तुमने गाय और आधार पढ़ने के बाद सर्च भी नहीं किया कि सरकार करना क्या चाह रही है। कर लेते तो थोड़ी समझ बन जाती और इतना बवाल नहीं करते। गायों को एक पहचान देना हिन्दू राष्ट्र की तैयारी नहीं है। सड़कों पर टहलती गाएँ, बंग्लादेश की तरफ स्मग्लिंग में जाती गाएँ, ग़ैरक़ानूनी कत्लगाहों की गाएँ, पॉलिथिन खाती गायों आदि के लिए सरकार ने ये प्रावधान किया है कि शुष्क डेयरी बनाई जाय और वहाँ से गायों के गोबर आदि से बने खाद को सरकार ख़रीदे और कुछ लोगों को रोजगार मिले।
आमिर खान के सत्यमेव जयते का एक एपिसोड याद आया जहाँ एक आदमी ने इलाके की शुष्क गायों को, जो दूध नहीं देतीं, बूढ़ी हैं, पालना शुरू किया। हर रात सब्ज़ी मंडी में फेंकी गई सब्ज़ियों को, या जो बच गई हैं, जिन्हें कोई लेगा नहीं, ख़रीद कर गायों को चारे के रूप में देता था। फिर जो गोबर आदि गाय करती थी उससे खाद बनाकर अच्छे खासे दाम में बेचता था। ऑर्गेनिक खाद का बहुत बड़ा बिज़नेस है ये, और साथ ही बायोगैस भी बनता है।
ख़ैर, जिनको गाय और आधार दिखता है उनको ये बात समझ में नहीं आएगी। आधार बहुत बदनाम हो चुका है, और साथ ही गाय भी। गाएँ तो भारत में बाज़ारों में बम लगाती हैं, इसीलिए उनसे घृणा करना ज़रूरी है। देश की सारी समस्या हिन्दुओं और उनकी गायों को लेकर ही है। अतः हिन्दू धर्म को बैन कर देना चाहिए और गायों से बनने वाले हर उत्पाद को खाना त्याग देना चाहिए।
इनकी स्मग्लिंग बहुत सही कार्य है क्योंकि बग़ल के गरीब देश को इससे रोजगार मिलता है। आख़िर हमें तो कुत्ता और बिल्ली चाहिए जो सिर्फ क्यूट होते हैं। जो हमें प्यार करते हैं। गाय क्या करती है? गाय तो सिर्फ दूध देती है, और इतने बड़े जानवर से प्यार की उम्मीद कैसे हो, उसको तो सींग होते हैं। है कि नहीं?
#Cow #AADHAAR
साभार :– अजीत भारती जी




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