*21 वीं सदी के महानतम संत सद्गुरू महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज का व्यक्तित्व और कृतित्व*
संजय कुमार सुमन
संपादक,दैनिक खोज खबर
नक्षत्रों में सूरज और चाँद की तरह महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के नाम अध्यात्म गगन में शोभायमान हैं, तो संतमत-सत्संग भी विश्व-सत्संग समुदाय में प्रथम श्रेणी में परिगणित हैं। यह संतमत आज जातिवर्ग और सम्प्रदाय के संकीर्ण घेरे से बाहर निकलकर पूरे मानव समुदाय को गले लगाने के लिए तैयार होकर आगे बढ़ रहा है। किसी संत की वाणी में है-
जे पहुँचे ते कहि गयेए तिनकी एकै बात ।
सबै सयाने एक मत तिनकी एकै जात ।।
अंत में संस्कृत और अध्यात्म के विज्ञ विद्वान पंडित रामविलास शर्मा के शब्दों में कहेंगे-
महर्षि मित्र हि महर्षि मेँहीँए महामहिम्नां महनीय कीत्र्तिः ।
नादानुसंधन विधन योगीए भारत देशस्य शिवावतारः ।।
21 वीं सदी के महानतम संत सद्गुरू महर्षि मेंहीं परमहंसजी महाराज का कल 9 मई को जयन्ती समारोह है।आइये आज हम उनके कृतित्व और व्यक्तित्व पर प्रकाश डालतें हैं

बिहार राज्यान्तर्गत पूर्णियाँ जिला के बनमनखी थाने में सिकलीगढ़ धरहरा नाम की पुरानी बस्ती है, जहाँ श्रीनसीबलाल दासजी के पुत्रा कायस्थ कुल भूषण बाबू बबूजन लाल दासजी रहते थे। इनका ससुराल खोखशी श्याम मझुआ ग्राम था, जो उदाकिशुनगंज अनुमंडल में पड़ता है। यह मधेपुरा जिला के अंतर्गत है। यह मधेपुरा पहले सहरसा जिला का एक अनुमंडल था। इसी खोखशी श्याम मझुआ गाँव को संतावतार सद्गुरू महर्षि मेँहीँ की पावनी जन्मभूमि होने का गौरव प्राप्त हुआ। यह खोखशी श्याम मझुआ ग्राम महर्षि मेँहीँ का ननिहाल है। इसके नानाजी श्रीयुत् बाबू विद्या निवास दासजी थे। आज उसी पावनी जन्मभूमि पर सद्गुरू महर्षि मेँहीँ के समर्पित विरक्त शिष्य पूज्यपाद संत शिशु सूर्य जी महाराज ने विशाल सत्संग आश्रम की स्थाना की है। यह आश्रम संतमत अनुयायियों के लिए परम पावन तीर्थस्वरूप है।
परमाराधय प्रात :स्मरणीय संत सद्गुरु महर्षि मेहीँ परमहंस जी महाराज संतो की अविछिन्न–परंपरा की एक अपूर्व और सर्वोत्कृष्ट कड़ी हैं। इस जगतितल पर आपक अवतरण विक्रमसवंत 1942 के वैशाख शुक्ल चतुदर्शी तदनुसार 28 अप्रैल , सन 1885 ई० को बिहार प्रान्त के मधेपुरा जिला के खोख्शी श्याम ग्राम में अपने मातामह के यहाँ हुआ था। चतुर्दिक खुशी का वातावरण छा गया। परम सौभाग्यवती महिमामती मातेश्वरी जनकवती जी अपने भाग्य पर फूली न समायी। जन्म के साथ ही बालक के सिर पर सात जटायें विद्यमान थीं। जिसने भी जटाओं को देखा, उसी ने बालक के महिमावान योगी पुरुष होने की भविष्यवाणी की।

ज्योतिषी पंडितजी को बालक के जन्म की तारीख, समय, मुहूर्त बताया गया। जन्म-कुण्डली तैयार करनेवाले पुरोहित ने भी बड़ी उत्सुकता और हर्ष के साथ घोषणा की कि यह बालक असाधारण पैदा हुआ है। यह अपने कुल खानदान का नाम तो रौशन करेगा ही; समाज और मुल्क में भी लोग इनका यशोगान करेंगे। बहुत सोच-विचार के बाद पंडितजी ने बालक का नामकरण किया रामानुग्रह लाल। सबने इस नाम की भी सराहना की। बाद में इनके वात्सल्य भाव रसिक चचेरे दादा-श्रीभारतलाल दासजी ने इनकी बुद्धि की महीनता को देख-परखकर बालक का छोटा-सा पुकारु नामकरण कर दिया मेँहीँ लाल। यही मेँहीँ लाल दास नाम इनके सद्गुरु महाराज ने भी इनकी सूक्ष्म बुद्धि को देखकर स्वीकार कर लिया। बाद में, सद्गुरु बाबा देवी साहब द्वारा इनका लिखा-पढ़ी का नाम स्वामी मेँहीँ दास और पुकारु नाम-‘लाला’ रखा गया था। यही मेँहीँ दास बाद में सद्गुरु के आशिष से साधना की पराकाष्ठा पर पहुँचकर सद्गुरू महर्षि मेँहीँ परमहंसजी महाराज के नाम से देश-विदेश में प्रसिद्ध हुए, जिनकी यशोगाथा आज भी गायी जा रही है। स्थिति को देखते हुए भविष्य में भी यह क्रम जारी रहेगा, संभव है।

पूज्य पिताश्री बाबू बबुजन लाल दासजी की तीन पत्नियाँ थीं- प्रथमा श्रीमती फूलवती देवीजी, द्वितीया श्रीमती जनकवती देवी और तृतीया-श्रीमती दयावती देवीजी। भावी संत बालक रामानुग्रह लाल दासजी, द्वितीया माता श्रीमती जनकवती देवीजी की लाड़ली संतान थी। इनसे बड़ी संतान धाम फूली असाधारण प्रसिद्ध फूलवती सुपुत्री झूलन दायजी थीं। ज्येष्ठ तनया झूलन दाय की शादी किशोरी बाल्यावस्था में ही कर दी गयी थी। दैवयोग से युवावस्था के पूर्व ही निःसंतान वह विधवा हो गयी। इस कारण से वह अपने नैहर में ही माता-पिता की छाया में आकर रहती थी और प्यार से अपने दुलारे भ्रातारत्न की दिल से सेवा किया करती थी। तृतीया माता श्रीमती दयावती देवीजी की भी दो संतान-प्रथम श्रीडोमन दासजी और द्वितीया संतान-बेटी रमाकान्ति देवी थी। प्रथमा माताश्री की कोई संतान नहीं थी। श्रीडोमन दासजी महर्षि मेँहीँ (रामानुग्रह लाल) के सौतेले भाई थे। उनके तीन सुपुत्र हैं-श्रीविनोद बाबू (वकील साहब), श्रीसुबोध् बाबू (स्वास्थ्य विभाग) और श्रीप्रबोध् बाबू (गृहस्थ साधु)। तीनों संतमत में दीक्षित सत्संगी हैं। प्रबोध् बाबू घर गृहस्थी को देखते हुए विरक्त साधु की तरह ही सत्संग प्रचार-प्रसार का कार्य करते हैं। श्रीडोमन दासजी बाद में विरक्त होकर संत किंकर दासजी महाराज के नाम से प्रसि( हुए। परिवार के सभी लोग निस्पृह होकर जीविकोपार्जन करते हुए सत्संग-भजन का जीवन जी रहे हैं। बालक रामानुग्रह लाल अभी निरा बालपन में ही थे कि इनके सिर से ममतामयी माता की शीतल छाया सदा के लिए उठ गयी। ये अनाथ-से हो गये। परन्तु बहिन
झूलन दाय अपनी सेवा में अपने प्यारे भाई को खिलाना-पिलाना, साफ-सफाई करना, नहलाना-धुलाना आदि करती रहती थी। यह भाई भी उस बहिन से प्यार के मारे ऐसा घुल-मिल गया था कि माता की तरह ही उन्हें खाने-पीने आदि के लिए तंग किया करते थे। भाई-बहिन का यह अलौकिक प्रेम विरले को नसीब होता है।
महर्षि मेँहीँ की पावनी जन्मभूमि सचमुच में खोखशी और श्याम ग्राम के बीच स्थित मझुआ ग्राम है। यहाँ पर महर्षिजी के नाना श्री विद्यानिवास दास रहते थे। उनकी चार संतानें थीं-(क) चमनलाल दास, (ख) वाना दाय उपर्फ जनकवती, (ग) वाका दाय और (घ) बच्चा लाल दास। इनका वंशवृक्ष अभी चल रहा है।-
ऐसा प्रायः देखा जाता है कि प्रभु-प्राप्ति के मार्ग में अनेकों बाधयें आती हैं। भक्त उन बधाओं को झेलते हुए चलता है। कुछ बधायें ऐसी भी होती हैं, जिसे झलने में भक्त असमर्थ हुआ करता है,उसे प्रभु की अहैतुकी कृपा ही समाप्त कर देती है। अर्थात् वे बधायें अपने आप ही समाप्त हो जाती हैं। इसके लिए एक कहावत है-“सॉप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी।”
रामानुग्रहलाल दासजी जब मात्रा 4 साल के ही थे, तो उनकी माताजी स्वर्ग सिधार गयीं। पाँच वर्ष की अवस्था में कुल पुरोहित के आज्ञानुसार रामानुग्रह लाल का मुंडन संस्कार सम्पन्न हुआ। मुण्डन संस्कार के बाद आपका अक्षरारम्भ गाँव के ही पाठशाला में हुआ। अक्षरारम्भ कैथी लिपि में हुआ। अपने जन्मजात संस्कार की तेजस्विता के कारण आपने अल्पकाल में ही कैथी लिपि के साथ ही देवनागरी लिपि भी सीख ली।

11 वर्ष की अवस्था में रामानुग्रह लालजी को पूर्णियाँ जिला स्कूल में पढ़ने के लिए भर्ती कर दिया गया। लौकिक स्कूली शिक्षा के साथ ही आप आध्यात्मिक ग्रंथों और पूजा-पाठ में भी अभिरुचि रखने लगे थे। ये खेल-कूद में भी अपने साथियों में सबके प्यारे बन गये थे। शिक्षक इन्हें अल्पवय में आध्यात्मिक अभिरुचि से मना करते थे, पर इनपर उनका असर नहीं होता था। 4 जुलाई, 1904 ई0 को आप परीक्षा दे रहे थे। आप प्रवेशिका की परीक्षा दे रहे थे और विषय था-अंग्रेजी। परीक्षा के प्रश्न-पत्रा का पहला प्रश्न था -“Quote from memory the poem ‘Builders’ and explain it in your own English.” अर्थात् निर्माणकर्ता शीर्षक पद को अपने स्मरण से लिखकर उसकी व्याख्या अपनी अंग्रेजी भाषा में करें। आपने ‘बिल्डर्स’ कविता की प्रथम चार पंक्तियों को इस प्रकार लिखा-
For the structure that we raise,
Time is with material’s field.
Our todays and yesterdays,
Are the blocks with which we build.
“इन पंक्तियों का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-“हमलोंगों का जीवन-मंदिर अपने प्रतिदिन के सुकर्म वा कुकर्म रूप ईंटों से बनता है। जो जैसा कर्म करता है, उसका जीवन वैसा ही बन जाता है। इसलिए हमलोगों को भगवद्भजनरूपी सर्वश्रेष्ठ ईंटों से अपने जीवन- मंदिर की दीवार का निर्माण करते जाना चाहिए। समय की सदुपयोगिता सत्कर्म में है और ईश्वर-भक्ति या भजन से बढ़कर श्रेष्ठ दूसरा कोई भी सत्कर्म नहीं है।”
इन उपर्युक्त हार्दिक उद्धारों की अभिव्यक्ति के बाद अंत में आपने तुलसीदास की पंक्ति को लिखा-“देह धरें कर यहि फल भाई। भजिये राम सब काम बिहाई।। यह पंक्ति लिखते-लिखते आप अपने भाव विह्नलता को रोक नहीं सके। आपने परीक्षा निरीक्षक (Invigilator) से कहा-“May I go out sir?” महाशय! क्या में बाहर जा सकता हूँ? निरीक्षक महोदय आपके मनोभाव को परख न सके और बाहर जाने की अनुमति दे दी। उन्होंने कहा- “Yes, you may go out”
फिर क्या था? जैसे जलाशय का बाँध् टूटने से जलधरा निर्बाध् गति से आगे बढ़ती है, उसी प्रकार आप भी साधु -संतों की खोज में अनन्त पथ के पथिक बन गये। आप भागते हुए स्वामी रामानन्दजी महाराज (रामानन्दी साधु) की कुटिया पर जोतरामराय पहुँच गये। पिताजी को जब पता लगा, तो वे व्याकुल हो गये और इन्हें घर लाने का प्रयास किया, पर ये नहीं लौटे। इसके पहले भी ये कई बार भागने का प्रयास कर चुके थे, पर बड़ी बहन की याद आते ही लौट आते थे। इस बार नहीं लौटे और रामानन्द स्वामी के आश्रम पर रह गये। ये उनसे पहले ही दीक्षित हो चुके थे।
रामानन्द स्वामी से आपको मानस जाप, मानस ध्यान और खुले नेत्रों से त्राटक के अभ्यास की विधि प्राप्त हुई थी। इस तरीके से आपने वर्षों अभ्यास किया, पर आपकी आत्मिक प्यास नहीं मिटी। तब ये अन्य महात्मा की तलाश मन ही-मन करने लगे, सोचने लगे। एक कहावत है-जहाँ चाह, वहाँ राह।’ गोस्वामी तुलसीदासजी ने भी लिखा है-
जौं तेहि पंथ चलै मन लाई । तौ हरि काहे न होई सहाई ।।
इसी कथन के अनुसार मेँहीँ बाबा की मुलाकात बाबा देवी साहब के एक भगवत् प्रेमी शिष्य रामदासजी से हो गयी-डाकघर में।
बातचीत के क्रम में रामदास बाबा, मेँहीँ बाबा से बोले-बाबा मेँहीँ दासजी! आप जिस गुरु की सेवा में जीवन का अनमोल समय खर्च कर रहे हैं, वे आपको आत्मज्ञान कराने में समर्थ नहीं हैं। इसपर मेँहीँ बाबा गुरु की निंदा सुनकर बिगड़ गये। रामदास बाबा तब भी बोले कि बिगड़ने से मेरा कुछ नहीं होगा? कान खोलकर सुन लें-जबतक आप हमारे सद्गुरु बाबा देवी साहब की शरण में नहीं आयेंगे, तबतक मुक्ति लाभ तो दूर है ही, उसकी राह का भी पता नहीं लगेगा। दोनों अपनी-अपनी जगह चल पड़े। बाबा रामदासजी, अपने गुरु भाई बाबा सिधार से मिलकर बोले कि देखना, मेँहीँ दास से जरा सावधन रहना, वह अपने वर्तमान गुरु का परम भक्त है। इसके बाद वे अपने गुरुदेव बाबा देवी साहब की सेवा में मुरादाबाद होकर पंजाब चले गये।
इधर मेँहीँ लालजी अपने गुरु की सेवा में लग गये। परन्तु अपने इस वर्तमान गुरु स्वामी रामानन्दजी के पास उनकी आध्यात्मिक जिज्ञासा का समाधन नहीं हो पाता था। इन्हें न तो साधना में प्रगति दिखाई पड़ती और न ही शंका समाधन हो पाता था। इसलिए वे किसी अच्छे और सच्चे गुरु की तलाश मन-ही-मन कर रहे थे। इसी क्रम में उनको बाबा धीरजजलालजी का पता चला कि वे एक अच्छे अभ्यासी हैं और ज्ञान- ध्यान की बातों को अच्छी तरह समझाते हैं। मेँहीँ बाबा उनके पास समय निकालकर पहुँचे। उनसे स्वाभाविक शिष्टाचार के उपरान्त बातचीत की। इन्होंने धीरजलालजी से पूछा कि क्या आप सत्संग करते हैं? धीरज बाबा बोले कि मैं संतमत का सत्संग करता हूँ।
मेँहीँ बाबा ने पूछा कि संतमत-सत्संग क्या है? धीरज बाबा बोले कि सारे आत्मज्ञानी महापुरुषों की आत्मा और परमात्मा संबंधी अनुभव ज्ञान को ही संतमत-सत्संग कहते हैं, जिसमें सबका एक मत हो। तब मेँहीँ बाबा ने पूछा कि क्या आप दरिया साहब को भी मानते हैं? धीरज बाबा बोले कि हाँ, अवश्य मानते हैंऋ क्योंकि वे भी तो संत थे और उनका विचार भी अनुभवपूरित है तथा अन्य संतों से मिलता है। तब मेँहीँ बाबा ने पिफर पूछा कि क्या आप उनकी वाणी को समझा सकते हैं? धीरज बाबा बोले कि जहाँ तक होगा, कोशिश करूँगा, अन्यथा अपने बड़े गुरु भाइयों तथा गुरुदेव से भी पूछकर बता सकता हूँ।
मेँहीँ बाबा ने पूछा कि मैं कब आपके पास आउॅं ? धीरज बाबा बोले कि जब भी आपको समय मिले, आ सकते हैं। मैं आपको यथासाध्य समय दूँगा। मेँहीँ बाबा बोले कि मुझे तो दस बजे रात में ही समय मिल सकेगा-आने के लिये। धीरज बाबा बोले कि आइये, मैं उस समय भी मिलूँगा-आपसे। मेँहीँ बाबा चले गये।
प्रबल आध्यात्मिक प्यास के कारण मेँहीँ बाबा गुरु की सेवा से निवृत्त होकर रात के 10 बजे दूसरे दिन आ पहुँचे, बाबा धीरजलाल की सेवा में। 10 बजे रात्रि से 3 बजे भोर तक सत्संग किया और फिर छुट्टी लेकर अपने गुरु रामानन्द स्वामी की सेवा में हाजिर हो गये। गुरुजी की सेवा में त्राुटि नहीं आयी।
दूसरे दिन भी यही दिनचर्या रही। इसी तरह 3-4 महीने तक अनवरत रूप से भोजन और आराम की चिन्ता त्यागकर आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त किये। फ्को बड़ छोट कहत अपराधू । गनि गुन दोष समुझिहहिं साधु ।। वाली कहावत इनपर चरितार्थ हो रही थी। दोनों आध्यात्मिक जगत् के उद्भट वीरपुरुष थे। एक तो सर्वस्व समर्पण करके गुरु का गुलाम बन चुके थे और दूसरे प्रबल उम्मीदवार थे। मेँहीँ बाबा को धीरज बाबा के सत्संग से बहुत संतुष्टि हुई। तब मेँहीँ बाबा कहने लगे, अब आप कृपा कर इस संतमत-सत्संग का व्यावहारिक ज्ञान बताने का कष्ट करें। इसके लिए मुझे क्या करना पड़ेगा, क्या शर्त अदा करनी पड़ेगी, कृपा कर वह भी बतायें।
तब बाबा धीरजलाल बोले कि आपने हमारे गुरु भाई बाबा रामदासजी से एक दिन डाकघर में झगड़ा (बहस) कर लिया था। वे हमसे कह गये हैं। मेँहीँ बाबा बोले कि उन्होंने मेरे वर्तमान गुरुदेव का अपमान किया, तो मैंने उनसे बहस किया था। क्योंकि गुरुदेव की निंदा सुननी पाप है-यह संतवाणी में मैंने पढ़ा है। अब अगर रामदास बाबा हमसे रुष्ट हैं, तो मैं उनसे क्षमा माँग लूँगा, आप उनका पता बताने का कष्ट करें। धीरज बाबा ने पंजाब का पता बताया। मेँहीँ बाबा ने उनके नाम से पत्र लिखा। वे बाबा देवी साहब की सेवा में थे। बाबा देवी साहब और रामदास के नाम से मेँहीँ बाबा ने पत्र लिखा और क्षमा माँगी। बाबा देवी साहब का आशिषयुक्त पत्रा रामदास बाबा ने धीरज लाल के नाम से लिखा और लौटाया। पत्रा धीरजलाल को मिला, फिर भी वे भजन-भेद बताने से इन्कार कर गये। मेँहीँ बाबा को भागलपुर- मायागंज में राजेन्द्र बाबू (वकील साहब) के पास भेज दिया। मेँहीँ बाबा वहाँ पहुँचे और बहुत-से शंकाओं का समाधान हुआ उनके पास। पिफर राजेन्द्र बाबू ने मेँहीँ बाबा को दृष्टि-साधन की क्रिया बताकर कहा कि मैं आपका गुरु नहीं हूँ। आपके गुरु बाबा देवी साहब ही होंगे, जो हमारे और बहुतों के हैं। फिर दुर्गापूजा में उनकी भेंट करने को कहा।
मेँहीँ बाबा, स्वामी रामानंदजी के पास लौट आये और सेवा में लग गये। दुर्गापूजा के अवसर पर पुनः भागलपुर, बाबा देवी साहब की सेवा में पहुँचे। राजेन्द्र बाबू ने इनकी भेंट बाबा साहब से करा दी। बाबा देवी साहब ने मेँहीँ बाबा को आशिष देकर कहा कि लाला! पहले तुम दरियापंथी थे, अब समुद्रपंथी हो गये। अब तुम भटकने से बच गये। मेँहीँ बाबा, दरियापंथी महात्मा रामानंदजी के शिष्य थे, इसीलिए बाबा देवी साहब ने इन्हें दरियापंथी कहा था।
बाबा देवी साहब से मिलकर मेँहीँ बाबा उनपर ही समर्पित हो गये और अपनी सेवा में रख लेने का आग्रह किया। बाबा साहब रीझ गये और आदेश दे दिया। बाबा साहब की सेवा में रहकर मेँहीँ बाबा ने कसकर ध्यान किया और उनके आदेश-उपदेश में अपने को ढाला। बाबा देवी साहब ने इन्हें कुम्भकार के घट की तरह गढ़ा और पक्का बना दिया। 1919 ई0 के 19 जनवरी को बाबा साहब का शरीर पूरा होने पर मेँहीँ बाबा बिहार के विभिन्न जगहों में रहकर ध्यान करते रहे। इसी क्रम में वे सिकलीगढ़ ध्रहरा, मनिहारी और भागलपुर के परवत्ती नामक महल्ले में भी रहकर ध्यान-सत्संग करते रहे। अंत में उन्होंने भागलपुर के मायागंज महल्ले के पास गंगा के पावन तट पर कुप्पा (गुफा) में रहकर गंभीर साधना की। कठिन शब्द डगर पर चलकर वे शांति को प्राप्त कर गये।

अब वे महर्षि मेँहीँ परमहंसजी के नाम से जाना जाने लगे। धीरे धीरे संतमत का प्रचार बिहार के बाहर नेपाल, बंगाल, उत्तरप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, असम, जम्मू-कश्मीर, महाराष्ट्र, गुजरात, केरल आदि प्रान्तों में भी हुआ। भारत के बाहर पाकिस्तान, अफगानिस्तान, रूस, अमेरिका, स्वीडेन, नार्वे, जापान, इंगलैंड आदि देशों में भी संतमत फैल गया। आज यह राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय संतमत की गरिमा से विभूषित हो गया है। लेकिन सबसे ज्यादा प्रचार क्षेत्र बिहार और झारखंड ही है। इन राज्यों में दैनिक, साप्ताहिक, मासिक और वार्षिक सत्संग चलता ही रहता है। ध्यान-साधना का भी आयोजन लोग करते ही रहते हैं।
कई किताबों की रचना की
महर्षि मेँहीँ द्वारा रचित साहित्य भी आज अध्यात्म-जगत् में विशेष समादृत है। वे हैं-सत्संग-योग, रामचरितमानस (सार सटीक), विनय-पत्रिका-सार सटीक, सत्संग-सुध-1,2, 3,4 भाग, संतवाणी सटीक, भावार्थ सहित घटरामायण पदावली, ईश्वर का स्वरूप और उसकी प्राप्ति, महर्षि मेँहीँ-पदावली आदि।
इस तरह मेँहीँ बाबा अपने चमत्कारपूर्ण जीवन जीते हुए तथा सत्संग-ध्यान का प्रचार करते हुए 8 जून, 1986 ई0 को भागलपुर के केन्द्रीय स्थल महर्षि मेँहीँ आश्रम में ब्रह्मलीन हो गये। इनके इस सत्संग अभियान को इनके वरिष्ठ शिष्यों ने आगे बढ़ाया और आज भी अनवरत रूप से चलता जा रहा है। इनके वरिष्ठ प्रचारक शिष्यों में पूज्यपाद बाबा श्रीधर दासजी महाराज, पूज्यपाद संतसेवीजी महाराज, पूज्यपाद शाही स्वामीजी महाराज, पूज्यपाद लच्छन दासजी महाराज, पूज्यपाद भुजंगी दासजी महाराज, पूज्यपाद संत किंकरजी महाराज, पूज्यपाद स्वामी विष्णुकान्तजी महाराज, पूज्यपाद स्वामी गंगेश्वरानंद जी महाराज, दलबहादुरजी महाराज, स्वामी हरिनन्दन दासजी महाराज, स्वामी भगीरथ दासजी महाराज, स्वामी प्रमोद बाबा, स्वामी छोटेलाल बाबा, पूज्य केदार बाबा आदि प्रमुख शिष्य हैं।
क्या हैं महर्षि मेँहीँ के उपदेश
1. यह सुन्दर मनुष्य शरीर पाकर जो क्षणिक विषय-सुख में लवलीन रहते हुए माते रहते हैं और इसी में अपना कुशल समझते हैं, वे अत्यन्त भूल में हैं।
2. रसायन विज्ञान की तरह सत्य है कि आॅक्सीजन और हाइड्रोजन (H2+O=H2O) को मिलाओ, पानी होगा। इसी तरह इंगला- पिंगला को मिलाकर रखो, प्रकाश होगा। वैज्ञानिक आविष्कार जैसे सत्य है, वैसे ही यह सत्य है।
3. कोई भी जल बाह्य संसार में नहीं है, जो हृदय को शु( कर सके। इसके लिए सत्य का व्यवहार होना चाहिए। सत्य के तट पर रहना चाहिए। सत्य का तट क्या है? सत्संग और ध्यान।
4. जिसका चेतन आत्मा तृष्णा की डोरी पर दौड़ती रहती है, उसके लिए शान्ति, तृप्ति और मुक्ति कहाँ!
5. जो संत वचनामृत का श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके आदर करते हैं, उनका परम कल्याण होता है।
6. लाचार होकर भी पाप कर्म हो जाने पर कोई पाप के पफल से बच नहीं सकता है। पाप का पफल अवश्य ही भोगना पड़ता है।
7. जो कहते हैं कि भजन करने के लिए मुझको समय नहीं है, यह बहुत गलत बात है। गपशप करने के लिए समय है, सिनेमा देखने के लिए समय है और भजन करने के लिए समय नहीं है-यह बहुत गलत बात है।
8. सत्य बोलोगे, तो दूसरों से पे्रेम बढ़ेगा। प्रेम से मेल होगा, मेल से बल बढ़ेगा, बल बढ़ाने की आवश्यकता है देश को।
9. तप असल में ब्रह्मचर्य-पालन करे, तो वह अच्छा तपी है। शरीर को तपावे और ब्रह्मचर्य का ध्यान नहीं रखे, तो वह उत्तम तप नहीं है।
10.यह सुन्दर मनुष्य-शरीर पाकर अपना जीवन सांसारिक विषयों को खो दो, तो रोना पड़ेगा, इसमें संदेह की बात नहीं है। इसलिए याद रखो, सुअवसर हाथ से न जाने दो।
11.ज्योति और शब्द के अतिरिक्त और कोई रास्ता ईश्वर तक पहुँचने के लिए मानने योग्य नहीं है।
12. जो अपनी मौत को प्रत्यक्ष की तरह देखता है। उनकी सब सांसारिक भोग-वासनाएँ छूट जाती हैं।
13. इस संसाररूपी तालाब में परमात्मा-रूपी निर्मल जल है। यदि माया के परदे को हटा दो, तो परमात्मारूपी निर्मल का दर्शन होगा।
14. जबतक जीवन धरण करें, तबतक सत्संग करें, तो अवश्य ही मरने के बाद वे आगे शरीर पावेगा, तो मनुष्य का शरीर पायेगा, दूसरा हो नहीं सकता।
15. अगर भजन में तरक्की चाहते हो, तो मानस जप कभी नहीं भूलना चाहिए, हरवक्त जारी रखना चाहिए।





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