“रविदास जयन्ती पर विशेष”

भारत के आध्यात्मिक क्षितिज पर 15वीं-16वीं शताब्दी में एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र का उदय हुआ जो न केवल एक महान संत, दार्शनिक, कवि और समाज सुधारक था बल्कि उसने उत्तरी भारत में भक्ति आन्दोलन का नेतृत्व किया। जी हां, मैं गुरू
रविदास जी की ही बात कर रहा हूँ। गुरू रविदास (रैदास) का जन्म काशी में माघ पूर्णिमा दिन रविवार को संवत् 1433 को हुआ था। उनके जन्म के बारे में एक दोहा प्रचलित है:

“चौदह से तैंतीस कि माघ सुदी पन्दरास।
दुखियों के कल्याण हित प्रगटे श्री रविदास।।”

रैदास ने साधु-सन्तों की संगति से पर्याप्त व्यावहारिक व आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त किया था। वे संत रामानन्द और कबीरदास के शिष्य थे। जूते बनाना उनका पारिवारिक व्यवसाय था जिसे वे पूरी लगन तथा परिश्रम से करते थे। उनकी समयानुपालन की प्रवृति तथा मधुर व्यवहार के कारण उनके सम्पर्क में आने वाले लोग भी बहुत प्रसन्न रहते थे। प्रारम्भ से ही बहुत परोपकारी तथा दयालु थे। साधु-सन्तों की सहायता करने में उनको विशेष आनन्द मिलता था। काम के अतिरिक्त शेष समय ईश्वर-भजन तथा साधु-सन्तों के सत्संग में व्यतीत करते थे। वे स्वयं मधुर तथा भक्तिपूर्ण भजनों की रचना करते थे और उन्हें भाव-विभोर होकर सुनाते थे। उनका विश्वास था कि ईश्वर की भक्ति के लिए सदाचार, परहित-भावना तथा सद्व्यवहार का पालन करना अत्यावश्यक है। रैदास की वाणी भक्ति की सच्ची भावना, समाज के व्यापक हित की कामना तथा मानव-प्रेम से ओत-प्रोत होती थी। इसलिए उसका श्रोताओं के मन पर गहरा प्रभाव पड़ता था। उनके भजनों तथा उपदेशों से लोगों को ऐसी शिक्षा मिलती थी जिससे उनकी शंकाओं का सन्तोषजनक समाधान हो जाता था और लोग स्वत: उनके अनुयायी बन जाते थे। उनकी वाणी का इतना व्यापक प्रभाव पड़ा कि समाज के सभी वर्गों के लोग उनके प्रति श्रद्धालु बन गये। कहा जाता है कि मीराबाई उनकी भक्ति-भावना से बहुत प्रभावित हुईं और उनकी शिष्या बन गयी थीं। मुग़ल शासक बाबर भी रविदास जी का अनुयायी बन गया और उनसे प्रभावित होकर अच्छे सामाजिक कार्य करने लगा। रैदास के 40 पद ‘गुरु ग्रन्थ साहब’ में मिलते हैं जिसका सम्पादन गुरु अर्जुन देव ने 16 वीं सदी में किया था। उनके अनुयायियों को ‘रविदास्सिया’ और उनके उपदेशों के संग्रह को ‘रविदास्सिया पंथ’ कहते हैं।अनुयायियों के अनुसार 1540 AD में वाराणसी में उन्होंने अंतिम सांस ली थी। वाराणसी में रविदास जी की याद में बहुत से स्मारक बनाये गए हैं जैसे: रविदास पार्क, रविदास घाट, रविदास नगर, रविदास मेमोरियल गेट आदि।

संत रविदास जी एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने भगवान की भक्ति में समर्पित होने के साथ अपने सामाजिक और पारिवारिक कर्त्तव्यों का भी बखूबी निर्वहन किया। इन्होंने लोगों को बिना भेदभाव आपस में प्रेम करने की शिक्षा दी और इसी तरह से वे भक्ति के मार्ग पर चलकर संत रविदास कहलाए। उनकी शिक्षाएं आज भी प्रेरणादायक हैं। तो चलिए उनकी जयंती पर जानते हैं उनके कुछ उपदेश व अनमोल वचन:

  1. “मन चंगा तो कठौती में गंगा।”

अर्थात् यदि मन पवित्र है और जो अपना कार्य करते हुए, ईश्वर की भक्ति में तल्लीन रहते हैं उनके लिए उससे बढ़कर कोई तीर्थ-स्नान नहीं है।

  1. “रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
    नकर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच।।”

अर्थात् कोई भी व्यक्ति छोटा या बड़ा अपने जन्म के कारण नहीं बल्कि अपने कर्म के कारण होता है। व्यक्ति के कर्म ही उसे ऊंचा या नीचा बनाते हैं। इसलिए, वे सभी को समान भाव से रहने की शिक्षा देते थे।

  1. “कृस्न, करीम, राम, हरि, राघव, जब लग एक न पेखा।
    वेद कतेब कुरान, पुरानन, सहज एक नहिं देखा।।
    चारो वेद के करे खंडौती ।
    जन रैदास करे दंडौती।।”

अर्थात् राम, कृष्ण, करीम, राघव आदि सब एक ही परमेश्वर के विविध नाम हैं। वेद, कुरान, पुराण आदि ग्रन्थों में एक ही परमेश्वर का गुणगान किया गया है।

  1. “कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै। तजि अभिमान मेटि आपा पर, पिपिलक हवै चुनि खावै।”

अर्थात् ईश्वर की भक्ति बड़े भाग्य से प्राप्त होती है। अहंकार-शून्य रहकर काम करने वाला व्यक्ति जीवन में सफल रहता है जैसे विशालकाय हाथी शक्कर के कणों को चुनने में असमर्थ रहता है जबकि लघु शरीर की पिपीलिका (चींटी) इन कणों को सरलतापूर्वक चुन लेती है। इसी प्रकार अहंकार त्याग कर, विनम्रतापूर्वक आचरण करने वाला मनुष्य ही ईश्वर का भक्त हो सकता है।

  1. “करम बंधन में बन्ध रहियो, फल की ना तज्जियो आस
    कर्म मानुष का धर्म है, सत् भाखै रविदास ..”

अर्थात् कर्म हमारा धर्म है और फल हमारा सौभाग्य। इसलिए हमें हमेशा कर्म करते रहना चाहिए और कर्म से मिलने वाले फल की आशा भी नहीं छोड़नी चाहिए।

  1. “काम क्रोध माइआ मद मतसर इन पंचहु मिलि लूटे/ इन पंचन मेरो मनु जू बिगारिओ।”

अर्थात् काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और ईर्ष्या मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं जो मनुष्य के चरित्र व आचरण दोनों को नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं। इसलिए इनसे हमेशा दूर ही रहना चाहिए।

  1. “माटी को पुतरा कैसे नचतु है। देखै सुनै बोलै दउरिओ फिरत है। जब कछु पावै तब गरबु करत है। माइआ गई तब रोवनु लगत है।”

अर्थात् शरीर यानी माटी का यह पुतला नाचता-दौड़ता फिरता रहता है। कुछ मिल जाता है, तो वह गर्वीला हो जाता है और माया खत्म होते ही रोने लगता है। उनका कहना है कि शरीर तो भौतिक वस्तु है, उसे तो एक न एक दिन नष्ट हो ही जाना है। इसलिए हमें इस पर अभिमान न कर अपने अंतस् को निखारना चाहिए।

  1. “रैदास कहै जाकै हदै, रहे रैन दिन राम।
    सो भगता भगवंत सम, क्रोध न व्यापै काम।।”

अर्थात् जिसके ह्र्दय में रात-दिन राम समाये रहते हैं, ऐसा भक्त राम के समान है। उस पर न तो क्रोध का असर होता है और न ही काम-भावना उस पर हावी हो सकती है।

  1. “हरि-सा हीरा छांड कै, करै आन की आस।
    ते नर जमपुर जाहिंगे, सत भाषै रविदास।।”

अर्थात् हरि के समान बहुमूल्य हीरे को छोड़ कर अन्य की आशा करने वाले अवश्य ही नरक जाएंगे। यानि प्रभु-भक्ति को छोड़ कर इधर-उधर भटकना व्यर्थ है।

  1. “जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
    रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।”

अर्थात् जिस तरह केले के पेड़ के तने को छीला जाये तो पत्ते के नीचे पत्ता, फिर पत्ते के नीचे पत्ता और अंत में पूरा पेड़ खत्म हो जाता है लेकिन कुछ नहीं मिलता। उसी प्रकार इंसान भी जातियों में बाँट दिया गया है। इन जातियों के विभाजन से इन्सान अलग-अलग बंट जाता है। अंत में, इन्सान भी खत्म हो जाते हैं लेकिन यह जाति खत्म नहीं होती है। इसलिए रविदास जी कहते हैं कि जब तक ये जाति-प्रथा खत्म नहीं होगी, तब तक इन्सान एक-दूसरे से जुड़ नहीं सकता है।

  1. “भगवान उस ह्रदय में निवास करते हैं जिसके मन में किसी के प्रति बैर-भाव नहीं है, कोई लालच या द्वेष नहीं है।”
  2. “जिस प्रकार तेज़ हवा के कारण सागर में बड़ी-बड़ी लहरें उठती हैं और फिर सागर में ही समा जाती हैं, उनका अलग अस्तित्व नहीं होता। इसी प्रकार, परमात्मा के बिना मानव का भी कोई अस्तित्व नहीं है।”
  3. “भ्रम के कारण साँप और रस्सी में अन्तर नहीं जाना जाता, किन्तु भ्रम दूर होते ही इनका अन्तर ज्ञात हो जाता है। उसी प्रकार, अज्ञानता के हटते ही मानव आत्मा-परमात्मा का मार्ग जान जाता है। तब परमात्मा और मनुष्य में कोई भेदभाव वाली बात नहीं रहती।”
  4. “भगवान ने इन्सान को बनाया है, न कि इन्सान ने भगवान को।”

अर्थात् हर इन्सान भगवान द्वारा बनाया गया है और सबको धरती पर समान अधिकार है।

  1. “जिस समाज में अविद्या और अज्ञानता है, उस समाज का उत्थान कभी नहीं हो सकता। इसलिए सभी मानवों को विद्या अर्जित करनी चाहिए।”

इस मानवतावादी संत व अप्रतिम समाज सुधारक ने आर्थिक विषमता, गरीबी, बेकारी और बदहाली से मुक्ति के लिए श्रम व स्वावलंबन का सिद्धांत दिया। बाह्याडंबर, ढकोसला व रूढि़यों आदि का खंडन कर एक नई वैज्ञानिक विचारधारा का निर्धारण किया जिससे हिंदू व मुस्लिम संस्कृति के मध्य की विशाल खाई को पाटने में काफी सहायता मिली। उनकी अमृत वाणी ने पूरे भारत में भावनात्मक एकता स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया। करुणा, मैत्री, प्रज्ञा, चेतना एवं प्रखर वैचारिकता पर आधारित इस महान संत की वाणी सदैव देश के दीन-हीन, दलित-शोषितों के उद्धार के लिए मुखर रही। वे जीवनपर्यन्त भेदभाव को समूल समाप्त करने के लिए प्रयासरत रहे। क्रांतिकारी रविदास मानते थे कि सिर मुंडाने, मूर्ति पूजने, भूखे-प्यासे रहकर कठिन तपस्या करने व योग एवं वैराग्य के पथ पर चलकर तथा इच्छाओं का दमन कर ईश्र्वर प्राप्ति नहीं होती। यही बात तथागत बुद्ध भी अपनी ‘धम्मदेशना’ में कहते हैं। इस तरह संत रविदास, तथागत बुद्ध की बात को बताते हुए देश व समाज में सामाजिक समरसता स्थापित करते दीखते हैं। वे अपने समय से बहुत आगे थे। अपनी क्रांतिकारी वैचारिक अवधारणा, सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना तथा युगबोध की मार्मिक अभिव्यक्ति के कारण उनका धर्म-दर्शन लगभग 600 वर्ष बाद आज भी पूर्ण प्रासंगिक है।

रविदास जयन्ती रविदास्सिया समुदाय के लिए वार्षिक उत्सव होता है। वाराणसी में इनके जन्म स्थान ‘श्री गुरु रविदास जनम अस्थान’ में विशेष कार्यक्रम आयोजित होते हैं जहाँ लाखों की संख्या में उनके भक्त पहुँचते हैं। सिख समुदाय द्वारा जगह-जगह पर नगर-कीर्तन का आयोजन किया जाता है। मंदिर, गुरुद्वारा में रविदास जी के गाने व दोहे बजाये जाते हैं। इस शुभ-अवसर पर सभी देश-वासियों को और खासकर उनके भक्तों को हार्दिक बधाई। रविदास जयंती मनाने का उद्देश्य यही है कि गुरु रविदास जी की शिक्षा को याद किया जाय व उनके द्वारा दिये गये उपदेश व संदेश को आत्मसात् किया जाय।

(लेखक श्री जय प्रकाश सिंह जो मूलत: सारण, बिहार से हैं; एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं और इस समय शिमला में आई जी, पुलिस के रूप में तैनात हैं।)