गांवों में रोजगार पैदा कर के, इस चुनौती को हम अवसर में बदल सकते है

✍नवीन सिंह परमार/(सिवान):

मैं एक मध्यम वर्ग के किसान परिवार से आता हूँ । दादा जी गांव में खेतीबारी करते थे, हालांकि पिता जी पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिला के उदलाबाड़ी में रहते थे । वहां भी एक छोटे से किराने की दुकान के साथ-साथ खेतीबारी ही मुख्य काम था । अच्छी खासी जमीन हुआ करती थी और धान की फसल भरपूर मात्रा में होती थी ।
शिक्षा उपार्जन की दृष्टि से जब मैं अपने नानी जी के पास आ गया तो यहां भी देखा की खेतीबारी ही मुख्य पेशा हैं । कुल मिलाकर मैं एक किसान परिवार का हूँ ।

वर्ष 2002 में मैं जब अपने गांव रहने के लिए आया तो ईमानदारी से प्रयास किया कि मैं भी एक पढ़े-लिखे किसान की तरह आधुनिक तकनीक से खेती करूं । खेती प्रारंभ भी किया, लेकिन समस्या सामने मुंह बाए खड़ी थी, उपज का सही बाज़ार व मुल्य नहीं मिलना । साथ-साथ ही साथ खेती-बारी में काम करने के लिए मजदूर का भारी अभाव । दो – तीन साल तक कैसे भी झेल लिया । उपज की खपत के लिए मंडी न मिलने के साथ उचित मूल्य का ना मिलना भी एक बड़ी समस्या थी । खुद और परिवार की व्यवस्था चल जा रही थी, लेकिन खेती में समय से काम करने वाले मजदूरों की किल्लत ने मेरे सारे उत्साह को ठंडा कर दिया , और मैं चाहते हुए भी अपने पुश्तैनी कर्म खेती-किसानी से अपने को अलग कर लिया ।

इस सब के पीछे जो मुख्य कहानी है कि गांव से पलायन होने व किसानों के उपज के लिए मंडी के अभाव व उनके उपज का सही मूल्य नहीं मिलने के कारण हमारे यहां गांव में अधिकांश लोग अपने पुश्तैनी कर्म खेती-किसानी से अपने को अलग कर लिए…
परिणाम सामने हैं, राज्य में रोजगार के लिए दूसरा अवसर नहीं होने के कारण सामान्य मजदूर वर्ग से लेकर मेरे जैसे मध्यम वर्ग के लोगों के सामने आजीविका के लिए पलायन ही एक मात्र रास्ता बच गया था । जिसका परिणाम हुआ कि गांव – गांव से लोगों का पलायन हुआ ।पहले लोग मजबूरी में पलायन किए, यह बाद के कालखंड में फैशन बन गया । परिणाम आज सामने हैं ।
एक संकट क्या आया कि वर्षों से देश के विभिन्न शहरों में जाकर बसे लोग आज अपने – अपने गांव की ओर भाग रहें हैं । बड़े – बड़े शहरों से गांव आने के लिए मारामारी पर उतारू हो रहे है ।
अच्छे व आधुनिक जीवन जीने के लिए लोगों ने अपने जिस गांव को अपनी बदहाली पर रोने के लिए छोड़कर शहर की शरण में आ गए थे, आज संकट के समय उसी बदहाल गांव की ओर बेतहाशा भाग रहें हैं ।

मैं पूछता चाहता हूं कि इस पलायन का लाभ क्या है ?
आज देश के विभिन्न बड़े शहरों में जो जहां हैं बेहाल है ,कोई पैदल बिहार लौट रहा है तो कोई अनुदान पर जीने को मजबूर है किसी को तो भीख पर ही आसरा है,फिर फायदा क्या इस पलायन से ?
क्या हम अपने गांव व आसपास रोजगार के अवसर नहीं खोज सकते है ?
यही समय हैं, विचार करने का…
आइए, इस चुनौती को एक अवसर में बदलने के लिए भागीरथी प्रयास करें ।
अब कुछ भी हो जाए, पलायन नहीं करें, अपने गांव व आसपास रोजगार पैदा करने का प्रयास करें व सरकार को बाध्य करेंगे रोजगार पैदा करने के लिए ।
अब संकल्प लेने का समय आ गया है ।इसके लिए चाहे जो हो, अगर सरकार से दो-दो हाथ करना पड़े तो करेंगे,
लेकिन पलायन नहीं करेंगे ।

[ लेखक वरिष्ठ पत्रकार व “परमार मीडिया नेटवर्क” के संचालक एवं शंखनाद सेन्टर फाॅर स्टडी, रिसर्च एंड डायलॉग, सीवान के निदेशक हैं ]