👉सामाजिक क्रांति के अग्रदूत- भिखारी ठाकुर 👈

✍- देवेंद्र नाथ तिवारी:
कवनो संस्कृति के उत्थान आ पतन खाति मानव समाज के उ चेतना उत्तरदायी होखेले जवन परिस्थिति विशेष के अनुकुल बनावे में सक्षम आ अक्षम होले. परिस्थिति देश आ काल के भीतर आपन स्वरूप ग्रहण करेले जवना के सम्यक बोध करे खाति इतिहास के आवश्यक्ता होखेला. एही अर्थ में सामाजिक चेतना के लक्षित कइल जाला. जवना के विद्वान लोग ऐतिहासिक अस्मिता के संज्ञा देले बा.
भोजपुरिया अस्मिता के नायकन में भिखारी ठाकुर जी भोजपुरी लोक संस्कृति आ साहित्य के सबसे सशक्त, जीवंत अन्वेषी रचनाशील हस्ताक्षर बानी. जवन पूरा भोजपुरी क्षेत्र के सीमा से बहरी भी भोजपुरी के मान-सम्मान के पताका फहरवले बानी. उनकर रचना आ लोक-नाटक से सामाजिक बदलाव के नया आकाश खुलल. गंगा-सोन के दियरा में बसल कुतुबपुर गाँव कृषि संस्कृति के साथे-साथे लोकगीत के भी धरती रहल बा. गंगा माई के लहर के साथे आजो अइसन लागेला की भिखारी ठाकुर के तान हिलोर मारत बा.
ओइसे भी इतिहास गवाह रहल बा कि इंसानियत के श्रेष्ठ साधना ही संस्कृति हऽ. एह साधना के भीतरी उ कुल्ही संस्कार आवेलन जवना के माध्यम से मनुष्य आपन सामूहिक चाहे सामाजिक आदर्शन के निर्माण करेला. भिखारी ठाकुर आपन नाटकन के माध्यम से तत्कालिन भोजपुरी समाज में फइल-पसरल कुरितियन पऽ जम के कठुराघात कइलें चाहे. उनकर नाटकन में ‘विधवा-विलाप’ होखे, ‘बेटी-बेचवा’ होखे आ फिर पलायन के दंश झेलत ‘बिदेसिया’ में सामाजिक संदर्भन के गंभीर व्याख्या कइल गइल बा.
कहल जाला कि जब रचनाकार अपना युग के संगत-असंगत बोध के साक्षात्कार अनुभुति के धरातल पऽ करेला तब उनका भीतरी एगो दृष्टि पैदा होखेले जवन सृजनात्मक होखेले. सृजन के एही बुनियाद पऽ भिखारी आपन नाटकन के माध्यम से समाजिक बुराई खत्म करे कोशिश कइले, उनका सफलता भी मिलल.
आज भोजपुरिया समाज व्यापक सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनितिक आ साहित्यक विघटन के युग से गुजर रहल बा. एह विघटन के दौर में भिखारी ठाकुर जइसन क्रांतिदुत के प्रासंगिकता अउर बढ़ जात बा. संक्रमण आ तलाश के दौर में आज फेर ‘भोजपुरी’ के एगो अउर ‘भिखारी’ के तलाश बा, जवन दिन-ब-दिन भोजपुरिया सांस्कृतिक क्षरण के रोखे आ भोजपुरी गौरव के स्थापना फेर से करे में सक्षम होखे-
कहत भिखारी नाई घरवा कुतुबपुर भाई,
जेकर नाम भइल बाटे बहुत दूर!!
जय भिखारी, जय भोजपुरी
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👉इनपुट : आखर
👉साभार : परमार डाॅट काॅम -सीवान