मांझी(सारण)। सात्विक आचार विचार हो तथा सदा रहन-सहन के साथ भोजन सात्विक हो तो बुढापा बोझ नहीं बन सकता। सन्त पतइया बाबा 102 वर्ष की उम्र में भी पूरी तरह स्वस्थ व सहज हैं। मांझी बहोरन सिंह के टोला के समीप सरयू तट पर अवस्थित राम जानकी मन्दिर के पुजारी सन्त पतइया बाबा इस उम्र में भी सालों भर सुबह शाम पवित्र सरयू में स्नान करते हैं तथा पवित्र सरयू का ही जल ग्रहण करते हैं। विधि विधान से भगवान का पूजन करने के अलावा स्वयं अपना भंडारा खुद तैयार करना तथा मंदिर के आसपास भरपूर साफ सफाई रखना उनकी दिनचर्या में शामिल है। वे प्रतिदिन लगभग 10 किमी खाली पांव पैदल चलते हैं। चौबीस घण्टे में मात्र एक बार खाना तथा अनेकों बार चाय का लुत्फ उठाना उनके स्वभाव में शामिल है। लोगों से प्राप्त रुपया पैसा कपड़ा व खाद्य सामग्री का संचय करना तो उन्होंने सीखा ही नही। दिन में जो मिला उसे शाम तक जरूरत मन्द के हवाले करने को बेताब रहते हैं। मुंह में एक भी दांत नही है। आस पास के लोग बताते हैं कि पिछले वर्षों से इनमें किसी प्रकार का शारीरिक बदलाव नही दिखा। लगभग पांच वर्ष पूर्व फूलों की सफाई करते वक्त उन्हें करैत सांप ने डँस लिया लेकिन इलाज के बाद वे पुनः चंगा हो गए। एक ही धोती का आधा भाग पहनने तथा उसमें से बचे आधी धोती को शरीर में लपेटने में इस्तेमाल करते हैं।
35 वर्षों तक चित्रकूट के जंगलों में पेड़ का पत्ता खाकर जीवन गुजारने वाले सन्त पतइया बाबा ब्रम्हलीन सन्त देवराहा बाबा तथा खपड़िया बाबा एवम त्रिदंडी स्वामी को अपना गुरु बताते हैं। आमतौर पर सहज जीवन बिताने वाले सन्त पतइया बाबा मूलतः आरा सदर ब्लॉक के घेघटा गांव के निवासी हैं। वे बताते हैं कि उनके पिताजी स्व दीप नारायण सिंह अंग्रेजी फौज में बतौर सिपाही थे। सेना से अवकाश ग्रहण के बाद वर्ष 1950 में उनके पिता का तथा 1951 में उनकी माता जी का निधन हो गया। वर्ष 1918 में जन्में पतइया बाबा बताते हैं कि बचपन में जार्ज पंचम के शासन होने की लोग बात करते थे। उनके तीन भाई व दो बहनें स्वर्ग सिधार चुकी हैं। 75 वर्ष की सबसे छोटी बहन जीवित हैं। उन्होंने बताया कि भगवान की सेवा करते हुए ब्रम्हलीन होने की उनकी आकांक्षा है। फिलहाल वे पूरी तरह हैं तथा जीवन में कभी न तो बीमार हुए हैं और न दवाइयों का सेवन किया है। उनका मानना है कि गंगा और सरयू नदी के जल का आजीवन सेवन ही उनके स्वस्थ रहने का महत्वपूर्ण राज है।