राजस्थान मेँ ये बिल पास हुआ तो न्यायपालिका के अधिकार सीमित हो जायेंगे,भ्रस्टाचारीयो की होगी मौज और पत्रकार जायेंगे जेल
राजस्थान में वसुंधरा सरकार सोमवार से शुरू हो रहे विधानसभा के सत्र में एक ऐसा विधेयक लाने जा रही है जो सांसद, विधायक, जज और अफसरों को कानूनी कार्रवाई से कवच प्रदान करेगी. जजों के ख़िलाफ़ तो वैसे भी कोई न तो पब्लिक में और न ही मीडिया में बोलता है मगर जजों को इसमें जोड़ कर एक किस्म की व्यापकता का अहसास कराया जा रहा है.
ये बिल पास हुआ तो बग़ैर सरकार की अनुमति के अफसरों के ख़िलाफ़ कोई एफआईआर नहीं होगी. 180 दिनों तक अनुमति नहीं मिलेगी तो कोर्ट के आदेश से एफआईआर होगी.
180 दिन लगाकर सरकार उन सबूतों के साथ क्या करेगी, यह बताने की ज़रूरत नहीं है. मतलब आपको इंतज़ार करना पड़ेगा कि सरकार 180 दिन के भीतर सारे सबूत मिटा दे, अपने अफसर को बचा ले और अनुमति भी न दे तब आप अदालत जाएंगे कि इस बचे खुचे मामले में कोई एफआईआर हो सकती है हुज़ूर?
घोटाले की ख़बरों को बाहर आने से हर हाल में रोका जाए, इसका इंतज़ाम किया जा रहा है ताकि पब्लिक को बताया जा सका कि हमारी सरकार में तो घोटाला हुआ ही नहीं. फिर एफआईआर की व्यवस्था को ही मिटा देनी चाहिए. यही सुरक्षा या कवच आम नागरिकों को भी दे दीजिए.
हर्षा ने लिखा है कि इस बिल के अनुसार किसी जज या अफसर की किसी कार्रवाई के ख़िलाफ़, जो कि उसने अपनी ड्यूटी के दौरान की हो, आप कोर्ट के ज़रिए भी एफआईआर नहीं करा सकते हैं. ऐसे मामलों में सरकार की मंज़ूरी लेनी होगी.
प्रावधान देखकर ही और स्पष्टता आएगी लेकिन अगर ऐसा है तो क्या अदालत भी एफआईआर के लिए 180 दिनों तक इंतज़ार करेगी? क्या उसे भी पहले सरकार से पूछना होगा कि एफआईआर के आदेश दे या नहीं? क्या इसके ज़रिए लोकतंत्र के उन कार्यकर्ताओं को बांधा जा रहा है जो घोटालों का उजागर करते हुए कोर्ट चले जाते हैं और एफआईआर का आदेश तक ले आते हैं?
इस प्रावधान का क्या तुक है कि जब तक एफआईआर नहीं होगी तब तक प्रेस में रिपोर्ट नहीं कर सकते हैं और ऐसे किसी मामले में नाम लिया तो दो साल की सज़ा हो सकती है.
असल में यह विधेयक सीएम की पहल पर ही लाया जा रहा है। सरकार ने भ्रष्टाचारियों को पकड़ने के लिए एसीबी का गठन कर रखा है, लेकिन यह जांच एजेंसी भी सरकार की स्वीकृति के बिना किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी के खिलाफ मुकदमा दर्ज नहीं कर सकती है। इसलिए भ्रष्टाचारियों से परेशान पीड़ित लोग कई अफसरों के खिलाफ सीधे कोर्ट में इस्तेगासा दायर कर मुकदमे के आदेश करवा रहे हैं। सरकार में बैठे लोगोें का यह मानना है कि इससे सरकार की छवि खराब हो रही है। अदालत के आदेश होते ही अफसरों के नाम अखबारों के प्रथम पृष्ठ पर छप रहे हैं। सरकार अब जो विधेयक ला रही है उसमें ऐसा प्रावधान है कि अदालत के आदेश के बाद भी पुलिस सरकारी कर्मिकों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज नहीं कर सकती है। भले ही कोर्ट ऐसे आदेश कर दें यानि कोर्ट के आदेश के बाद भी संबंधित पुलिस को पहले राज्य सरकार से अनुमति लेनी होगी। जब तक सरकार की अनुमति नहीं मिलेगी तब तक मुकदमा भी दर्ज नहीं हो सकेगा। इतना ही नहीं मात्र आरोप के आधार पर खबर प्रकाशित करने वाले व्यक्ति को तीन वर्ष तक की सजा दी जा सकेगी। सरकार में बैठे लोग माने या नहीं, लेकिन यदि यह विधेयक पास होता है तो भ्रष्ट अधिकारी और निर्भय हो जाएंगे। अभी जिन लोगों का सरकारी दफ्तरों में काम पड़ता है उन्हें पता है कि भ्रष्टाचार किस तरह फैला हुआ है। जायज काम भी रिश्वत दिए बिना नहीं होता। अच्छा होता कि सरकार ऐसा कोई कानून लाती, जिससे भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता। सब जानते है कि सरकार का यह विधेयक आसानी से विधानसभा में पास हो जाएगा, क्योंकि 200 में से 162 विधायक भाजपा के हैं।