पटना में आद्य पत्रकार देवर्षि नारद के स्मृति में समारोह आयोजित
🔸लोक बोलियों को लिखने-बोलने में करें शामिल- जगदीश उपासने
🔸जीवन भर की पत्रकारीय उपलब्धि के लिए वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र मिश्र को देशरत्न डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान
🔸विशेष रिपोर्टिंग के लिए पत्रकार अविनाश कुमार को केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान
🔸सृजनात्मक पत्रकारिता के लिए संतोष कुमार को बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान

पटना, 12 मई:स्थानीय बोली बोलने पर आज की पीढ़ी हीनता की भावना महसूस करती है। यह संपूर्ण समाज व देश के लिए चिंता की बात है। आज अगली पीढ़ी को लोक शब्दों की जानकारी नहीं है इसके लिए किसी बाहरी ताकत को जिम्मेदार ठहराने की बजाय हरेक व्यक्ति लोेक भाषा का प्रयोग करना शुरु करे तो हम अपने जड़ से जुड़े रह सकते हैं। उक्त बातें माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति जगदीश उपासने ने कहीं। वे शनिवार को विश्व संवाद केंद्र द्वारा आयोजित आद्य पत्रकार देवर्षि नारद स्मृति कार्यक्रम सह पत्रकारिता सम्मान समारोह में बतौर मुख्य अतिथि बोल रहे थे।
उपासने ने कहा कि अंग्रेजी शासन ने संस्कृत को मार दिया और उसकी जगह पर वर्ण शंकर भाषा उर्दू, फारसी तथा सबसे अधिक अंग्रेजी थोप दी। आज स्थिति यह है कि आज का युवा न तो ठीक से हिन्दी बोल पाता है और न अंग्रेजी बोल पाता है। स्थानीय बोलियां नष्ट होने से एक क्षेत्र विशेष की जीवन शैली के बारे में भी पता करना कठिन हो जाता है। यूनेस्को की हर दिन एक रिपोर्ट आती है कि आज कौन सी बोली इस दुनिया से समाप्त हो गई। उदाहरण के लिए अंडमान-निकोबार की कई बोलियां उनके बोलने वालों के मर जाने के साथ ही खत्म हो गई क्योंकि उनको लिपिबद्ध करने वाला कोई नहीं था। इसलिए यह जरूरी है कि लोक बोलियों को न सिर्फ आम बोलचाल में प्रयोग किया जाए बल्कि पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखा जाय। उन्होंने कई उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि मीडिया कैसे लोक भाषाओं से दूर होता जा रहा है। लोक भाषाओं के संरक्षण व संवर्द्धन में शिक्षण-संस्थाओं का बड़ा योगदान हो सकता है। उन्हें इन भाषाओं का प्रयोग करना विद्यार्थियों के बीच शुरू करना चाहिए। हर चीज सरकार के भरोसे नहीं हो सकती। सरकार पर दबाव तभी पड़ेगा जब उसके लिए समाज खड़ा होगा। इसलिए हरेक व्यक्ति लोक भाषा को बिना किसी हीन भावना के प्रयोग करना शुरू करे और अगली पीढ़ी को इससे अवगत कराये।
मुंगेर विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रंजीत वर्मा ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि यह एक स्थापित मान्यता है कि किसी भी विकसित देश में दूसरे देश की भाषा नहीं बोली जाती। उदाहरण के लिए इंग्लैंड, अमेरिका व अस्ट्रेलिया छोड़कर दुनिया के किसी विकसित देश में पूर्णरूप् से अंग्रेजी नहीं बोली जाती। इसका कारण है कि दूसरी भाषा में व्यक्ति खुद को संपूर्णता में व्यक्त नहीं कर पाता। आज लोक भाषाओं से दूर होने का ही कारण है कि अंग्रेजी से हिन्दी अनुवाद कर जो समाचार रपट तैयार होती है उसमें भाव के संप्रेषण गलत हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि उनका प्रयास है कि विश्वविद्यालय स्तर पर स्थानीय बोलियों के माॅड्यूल्स तैयार किये जायें, इसके पीछे धारण यह है कि किसी भी ज्ञान को हम अपनी मातृभाषा में सर्वश्रेष्ठ ढंग से समझते हैं। हम आज भी अंग्रेजी मानसिकता से ग्रसित हैं इसलिए लोक बोलियों के प्रयोग में हिचकते हैं। इसमें सुधार लाने का दायित्व मीडिया पर है। मीडिया स्थानीय बोलियों को महत्व देकर उनका महिमामंडन करे ताकि यह जन सामान्य के बीच लोकप्रिय हो जाये। उसके बाद स्वतः लोग गर्व के साथ अपनी बोली में संवाद करेंगे।
लोक भाषा विशेषज्ञ प्रमोद कुमार सिंह ने विषय प्रवेश कराते हुए कहा कि भाव और संवेदना ही लोक की ताकत है। लोक जीवन में विश्वासों की अधिकता होती है। व्यक्ति समाज और प्रकृति का यहां अद्भुत संयोजन दिखता है। उन्होंने कई लोक शब्दों का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि लोक में मनुष्यता को बचाये रखने के सारे उपक्रम मौजूद हैं। आधुनिकता के दौर में लोक शब्द विलुप्त हो रहे थे लेकिन बाजार के विस्तारीकरण ने लोक शब्दों को प्रचार व विज्ञापन का माध्यम बना दिया। इस बहाने भी लोक शब्द सार्वजनिक जीवन के पटल पर दृष्टिमान हो रहे हैं। उन्होंने महत्व देते हुए बताया कि लोक शब्दों के संरक्षण का सबसे अच्छा तरीका है कि इसका प्रयोग करने में गर्व महसूस करें, हीनता नहीं।
इससे पूर्व विश्व संवाद केंद्र के सचिव डाॅ. संजीव चैरसिया ने संस्था के गतिविधियों को रेखांकित करते हुए बताया कि विश्व संवाद केंद्र पत्रकारिता, शिक्षा व समाज में हो रहे अवमूल्यन को रोकने के लिए प्रतिबद्ध है और यह पत्रकारिता सम्मान समारोह उसी की एक कड़ी है। डाॅ. चैरसिया ने बताया कि मीडिया, सिनेमा व कला पर विभिन्न गोष्ठी, कार्यशाला, परिचर्चा आयोजित कर इन क्षेत्रों में गुणात्मक सुधार लाने के लिए संस्था लगातार कार्य कर रही है।
इससे विश्व संवाद केंद्र द्वारा पत्रकारिता सम्मान समारोह में तीन पत्रकारों को सम्मानित किया गया। जीवन भर की पत्रकारीय उपलब्धि के लिए वरिष्ठ पत्रकार देवेन्द्र मिश्र को देशरत्न डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद पत्रकारिता शिखर सम्मान, विशेष रिपोर्टिंग के लिए पत्रकार अविनाश कुमार को केशवराम भट्ट पत्रकारिता सम्मान तथा सृजनात्मक पत्रकारिता के लिए संतोष कुमार को बाबूराव पटेल रचनाधर्मिता सम्मान से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर विश्व संवाद केंद्र द्वारा प्रकाशित स्मारिका बिहार में मीडिया का विमोचन किया गया।
कार्यक्रम का धन्यवाद ज्ञापन करते हुए विश्व संवाद केंद्र के अध्यक्ष श्रीप्रकाश नारायण सिंह ने कहा कि विश्व संवाद केंद्र विगत 17 वर्षों से पत्रकारिता व शिक्षा के क्षेत्र में गुणात्मक कार्य करने के लिए कृतसंकल्प है। इन वर्षों में संस्था ने बिहार के तीन दर्जन से अधिक पत्रकारों को सम्मानित किया है। यह सम्मान लाख विसंगतियों के बावजूद मूल्य आधारित पत्रकारिता के महत्व का द्योतक है। कार्यक्रम का मंच संचालन सरिता सिंह ने किया।
( इनपुट : परमार डाॅट काॅम-सीवान )




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