*राष्ट्रकवि दिनकर जी नवजागरण के अग्रदूत और युग प्रहरी साहित्यकार थे
*दिनकर जी क्रांति और कोमलता के कवि थे
*दिनकर की कविताओ में ओज, विद्रोह, आक्रोश और क्रान्ति की झलक मिलती है

रिपोर्ट-कुमुद रंजन सिंह-
बिहारशरीफ- नालंदा, 23 सितम्बर 2020 : स्थानीय बिहारशरीफ के एतवारी बाजार मोहल्ले स्थित संगीतज्ञ एवं साहित्यमर्मज्ञ संगीत सम्राट अशोक सिंह के “भारतीय सांस्कृतिक कलाकेन्द्र” संस्थान में साहित्यिक मंडली “शंखनाद” नालंदा के तत्वावधान में देश के लोकप्रिय साहित्य-चूड़ामणि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की 112 वीं जयंती साहित्यिक मंडली “शंखनाद” के अध्यक्ष साहित्यकार डॉ० लक्ष्मीकांत सिंह की अध्यक्षता में समारोहपूर्वक मनाई गई।

समारोह का उद्घाटन साहित्यकार कवि प्रो० डॉ० लक्ष्मीकांत सिंह, साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा, संगीत सम्राट अशोक सिंह ने संयुक्त रुप से दीप प्रज्जवलित कर कार्यक्रम की शुरूआत किया और राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर के तैलचित्र पर फूल-माला चढाकर श्रद्धासुमन अर्पित किया।

इस मौके पर साहित्यिक मंडली “शंखनाद” नालंदा के सचिव साहित्यप्रेमी साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा ने अपने सम्बोधन में कहा- हिन्दी साहित्य के साहित्य-चूड़ामणि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जी एक सफल आदर्श शिक्षक, प्रखर लेखक, सुविख्यात कवि और प्रकांड निबंधकार थे। दिनकर जी 03 जनवरी 1933 को उच्च विद्यालय बरबीघा के प्रधानाध्यापक बने थे तथा ये 21 जुलाई 1934 तक रहे। दिनकर जी ने उच्च विद्यालय बरबीघा से संसद भवन दिल्ली तक की यात्रा की, बावजूद वे बिहार की धरती बरबीघा को नहीं भूले। दिनकर गरीब किसानों, मजदूरों और देश के लिए लड़ने वाले जवानों के लिए लिखे हैं। जो कवि जनता को प्यार नहीं करता, जनता भी उसे भुला देती है। रामधारी सिंह दिनकर भारतीय संस्कृति, समाज और राष्ट्रीयता के महाकवि थे। उनकी रचनाओं की प्रासांगिक आज और बढ़ गई है। दिनकर जी एक साधारण शिक्षक से लेकर पद्म विभूषण की उपाधि तक का सफर किया। दिनकरजी को हिंदी साहित्य में विशेष योगदान के लिए भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 1559 में इन्हें पद्मभूषण से अलंकृत किया। इसी वर्ष इन्हें पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ। दिनकर जी की प्रमुख कृति “कुरुक्षेत्र“ की एक पंक्ति – “क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन विषहीन विनीत सरल हो।” आज भी लोगों के जुबान पर सुनने को मिलते हैं। देश की आजादी की लड़ाई में भी दिनकर जी ने अपना योगदान दिया। वह महात्मा गाँधी के बड़े मुरीद थे। राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ के समृति में भारत सरकार द्वारा वर्ष 1999 में डाक टिकट जारी किया गया। इस शिक्षक समाज के महान विभूति को मेरे तरफ से शत शत नमन।

समारोह को संबोधित करते हुए साहित्यकार कवि प्रो० डॉ० लक्ष्मीकांत सिंह ने कहा कि ‘सच’ को कविता में पिरोने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की आज 112 वीं जयंती है। उन्होंने कहा कि बिहार के बेगूसराय जिले के सिमरिया में 23 सितम्बर 1908 को जन्म लेनेवाले दिनकर की रचनायें देशवासियों को झकझोर देती थी। भ्रष्टाचार पर उनकी रचना “सिंहासन खाली करो की जनता आती है” और देश के उन लाखों शहीदों के लिये समर्पित उनकी रचना “कलम आज उनकी जय बोल” लोगो की जुबां पर है। अंग्रेजी हुकूमत को अपनी लेखनी से हिलाकर रख दिया था। हुंकार, रश्मिरथी उनकी प्रमुख रचनायें हैं। दिनकर जी ने अपनी ज्यादातर रचनाएं ‘वीर रस’ में कीं। ‘भूषण’ के बाद दिनकर ही एकमात्र ऐसे कवि रहे, जिन्होंने वीर रस का खूब इस्तेमाल किया। वह एक ऐसा दौर था, जब लोगों के भीतर राष्ट्रभक्ति की भावना जोरों पर थी। दिनकर ने उसी भावना को अपने कविता के माध्यम से आगे बढ़ाया। साहित्यिक क्षेत्र में रामधारी सिंह दिनकर को ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दिनकर की रचनायें नागरिकों के मन में देश भक्ति जगाने का काम करती है। आज की नयी पीढ़ी के लेखकों को उनकी रचनाओं से प्रेरणा लेनी चाहिये।

शंखनाद के मीडिया प्रभारी राष्ट्रीय गजलकार नवनीत कृष्ण ने कहा कि राष्ट्रीय चेतना के प्रखर और ओजस्वी कवि रामधारी सिंह दिनकर सामाजिक दायित्व और वैश्विक बोध के भी बड़े प्रभावशाली कवि थे। एक तरफ उनकी कविताएँ शौर्य और पराक्रम की अग्निधारा प्रवाहित करती हैं तो दूसरी तरफ प्रेम और स्पर्श की कुसुमित फुलवारी में मदन-विहार के रसमय दृश्य भी दिखलाती हैं। मायालोक के भटकाव से लेकर स्वर्गलोक के आकर्षण तक दिनकर की कविताओं में आकार लेते हैं मगर पृथ्वीलोक का कर्मकर्तव्य कहीं छूटता नहीं है ।जीवन-संघर्ष से जूझने में कवि अपने पुरुषार्थ को सार्थक मानता है ।वह पलायन में नहीं सामना करने में समस्याओं का समाधान ढूंढता और निकालता है ।वह धरती के यथार्थ को स्वीकारता गीता के कर्मवाद में विश्वास करता है ।मनुष्य की कर्मठता भागने में नहीं डटकर मुकाबला करने में सिद्ध होती है।

समारोह में साहित्यसेवी धीरज कुमार ने कहा कि दिनकर जी ने राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत एवं क्रांतिकारी संघर्ष को प्रेरणा देने वाली ओजस्वी कविताएं लिखकर एक अमिट छाप छोड़ी है। दिनकर जी काव्य कला के माध्यम से हर स्तर पर शोषण, अत्याचार एवं अन्याय का विरोध किया। उनके द्वारा देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना से जन-जन को प्रेरित कर स्वतंत्रता संग्राम को सार्थक गति प्रदान की गई।

कार्यक्रम में साहित्यमर्मज्ञ संगीत सम्राट अशोक सिंह ने कहा कि राष्ट्रकवि की समस्त कृतियां कालजयी हैं। दिनकर जी की कविताओं में समाज तथा देश सेवा के भाव भरे पड़े थे। उनकी कविताओं में देश को उन्नति की राह पर ले जाने तथा उंचाईयों को छूने के भाव भरे हैं ।

कार्यक्रम का संचालन “शंखनाद” के मल्टीमीडिया प्रभारी राष्ट्रीय गजलकार नवनीत कृष्ण ने तथा धन्यवाद ज्ञापन साहित्यकार राकेश बिहारी शर्मा ने किया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में कविता पाठ तथा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

इस दौरान साहित्यसेवी सरदार वीर सिंह, साहित्यसेवी ब्रज भूषण प्रसाद, शिवकुमार प्रसाद, राजीव रंजन कुमार, विशाल कुमार, सुरेंद्र प्रसाद, सुजय कुमार, पंकज कुमार रमेश कुमार, शुभ्रांशु रेयान, संतोष कुमार, दीपक कुमार सहित कई लोगों ने भाग लिया।