
मृगांक शेखर सिंह जमुई (बिहार)
खेती सूबे बिहार राजनीति के गलियारों में अहम भूमिका वाले नेताओं के बावजूद जिले में कल-कारखाने नहीं लगाए जा सके। हालांकि, पहाड़ी व मैदानी भौगोलिक स्थिति वाले जमुई जिले में कमोबेश हर तरफ सुविधा पहुंच गई है। लोगों के आवागमन के रास्ते सुगम हो गए हैं। लेकिन आमदनी बढ़ाने की व्यवस्था यहां नहीं बढ़ पाई है।
परिणामस्वरूप जिले के लोगों का रोजगार की तलाश में एवं मजदूरी के खोज में पलायन मजबूरी बन गया है। वैष्विक महामारी कोरोना काल में परदेश से लौटने वालों की लंबी कतार ने इस मुद्दा का जीवंत कर दिया है।आंकड़े के अनुसार, जिले में 32 हजार प्रवासी लौटे थे। हालांकि स्वयं के साधनों व पैदल लौटने वालों की संख्या भी काफी रही थी।
अनुमानन लगभग पचास हजार से अधिक लोग परदेश से अपने-अपने गांव लौटे हैं। इस तस्वीर ने रोजगार सृजन के अभाव को पर्दे पर ला दिया है। ऐसा नहीं है कि जिले में उद्योग या कल-कारखाने की संभावना नहीं की जा सकती है। यहाँ प्राकृतिक रूप से संपन्न और खनिज के बावजूद इस ओर किसी ने ध्यान देना उचित नहीं समझा। रोजगार की कवायद मनरेगा तक ही सिमट कर रही गई। पढ़े लिखे योग्यताधारियों को नौकरी की तलाश में देश के अन्य राज्यों का सफर करना मजबूरी है। ऐसे में युवाओं की सोच भी चुनाव के परिणाम को प्रभावित कर सकती है।
वर्ष 1984 में जमुई जिले के सोनो प्रखंड में पहली बार सोना होने का पता चला था। इसकी जानकारी मिट्टी में स्वर्णकण मिलने के बाद लोगों को हुई। इसके बाद प्रशासनिक हलचल मचा। दावे-दावे का दौर चला लेकिन वक्त के साथ यह सिर्फ यादें बनकर रह गया है।
जिले के चकाई प्रखंड में सफेद पत्थर, स्लेट पत्थर और ढिबरा मायका पाया जाता है। इन पत्थरों का संगमरमर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माण में उपयोग किया जाता है।सूत्रों की माने तो इस इलाके से इन पत्थरों की तस्करी भी की जाती है,परन्तु इसे रोजगार की संभावनाओं में बदलने की कोशिश नहीं की गई।
जिले में खेती वृहत पैमाने पर होती है। यहां के लोग पंजाब और बंगाल उत्पादन के सील पैक चावल खाते हैं। लेकिन जिले में इन उत्पादों से संबंधित उद्योग स्थापित करने का प्रयास नहीं किया गया। जमुई मलयपुर रोड स्थित खैरमा गांव से हर दिन धान लदे ट्रक बर्द्धमान भेजा जाता है। फिर यहां के धान से तैयार चावल यहीं के दुकानों में पहुंच जाती है और लोग चाव से खातें हैं। जिले में इस तरह के उद्योग स्थापित नहीं हो सका। जिला के लोंगो की माने तो अगर जिले में उद्योग स्थापित हो जाते तो पढ़-लिखे सहित किसी को भी अन्य परदेश में रोजीरोटी के लिए जाना नही पड़ता।




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