सीवान : शहादत दिवस पर नमन किए गये चुआड़ विद्रोह के महानायक क्रांतिवीर रघुनाथ महतो
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✍दैनिक खोज खबर के लिए राकेश लववंशी के साथ कुमार विपेंद्र की रेपोर्ट
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सीवान : कुछ ही समय पहले गठित किए गये पटेल स्वाभिमान मंच ने देश के भूले – बिसरे स्वतंत्रता सेनानियों एवं महापुरूषों की जयंतियां और शहादत दिवस को मनाने का जो सिलसिला आरंभ किया है।इसकी चर्चा अब लोगों में व्यापक तौर पर होने लगी है।इसी की कड़ी में अखंड बिहार (अब झारखंड) में जन्में अमर शहीद रघुनाथ महतो को उनके शहादत दिवस पर नमन किया।इनके कृति की चर्चा करते हुए प्रो• रणविजय सिंह ने कहा कि जिन लोगों ने देश की गुलामी की जंजीर को तोड़ने के लिए, अंग्रेजों के अत्याचार,शोषण तथा जुल्म के खिलाफ हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहूति दी, उनमें अमर शहीद रघुनाथ महतो का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।इनकी सांगठनिक क्षमता एवं युद्ध कला से अंग्रेज भी डरते थे।
 इनके साथ डेढ़-दो सौ लोगों का हथियारों से लैस लड़ाकू दस्ता रहता था।फलत: अंग्रेज सेना भी पकड़ने का हिम्मत नहीं करती थी। ऐसे क्रांतिवीर रघुनाथ महतो का जन्म तत्कालीन जंगल महल वर्तमान सरायकेला-खरसावां जिला के नीमडीह प्रखंड के घुटियाडीह में 21 मार्च 1738 को एक किसान परिवार में हुआ था।इनकी माता करमी देवी तथा पिता काशीनाथ महतो थे. रघुनाथ महतो बचपन से ही निर्भीक एवं विद्रोही स्वभाव के थे।एक बार एक तहसीलदार रघुनाथ महतो के पिता से किसी बात को लेकर उलझ गया। रघुनाथ महतो को यह सहन नहीं हुआ। उन्होंने तहसीलदार को मारते-पीटते गांव के बाहर खदेड़ दिया।
 
वहीं उमेश सिंह पटेल ने कहा कि आज झारखंड के अलग हो जाने से बिहार के लोग उन्हें भूलते जा रहे हैं।परंतु उनके  समय जब अंग्रेजों का जल, जंगल एवं जमीन हड़पने के साथ-साथ अन्याय, अत्याचार एवं शोषण चरम पर पहुंच रहा था। उसका सर्वप्रथम विरोध 1769 ई. में झारखंड की धरती पर रघुनाथ महतो ने किया था। इसके पूर्व ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ आवाज उठाने की किसी में हिम्मत थी ही नहीं।
 शिक्षक नेता जयप्रकाश सिंह ने बताया कि वे रातों को जाग कर किसानों को संगठित कर अंग्रेजों की गुलामी तथा जुल्म के खिलाफ संघर्ष करने के लिए प्रेरित करते थे, लोगों में जोश भरते थे। वह जानते थे कि यदि स्वाभिमान के साथ जीना है तो क्रांति के सिवाय कोई चारा नहीं है।फलत: रघुनाथ महतो ने 1769  में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन नीमडीह के मैदान में अंग्रेजों के दमन नीति के खिलाफ जनसभा बुलायी।अंग्रेजों को ललकारते हुए महात्मा गांधी के बहुत पहले नारा दिया ” अपना गांव अपना राज, दूर भगावो अंग्रेज राज ” उस विशाल जनसभा में उपस्थित सभी ने अंग्रेजों को किसी भी प्रकार का कर नहीं देने का संकल्प लिया।इसके बाद तो जन-जन में विद्रोह की चिनगारी भड़क उड़ी और यह क्रांति की चिनगारी पातकूम, बड़ाभूम, धालभूम, मिदनापुर, गम्हरिया, सिल्ली, सोनाहातु, बुण्डू, तमाड़, रामगढ़ आदि जगहों पर फैल गयी। अंग्रेजों को मालगुजारी मिलना बंद हो गया.।जब्त की गयी जमीन पुन: अंग्रेजों से छीनी जाने लगी। गांव-गांव में रघुनाथ महतो के नेतृत्व मे विद्रोही दस्ता तैयार होने लगा। तीर धनुष, टांगी-फरसा, गुलेल इनके प्रमुख अस्त्र थे।इन्हीं अस्त्रों के बल पर बंदूक एवं तोप से लैस अंग्रेजी सेना को रघुनाथ महतो ने कई बार पराजित किया। रघुनाथ महतो जंगल महल में एक सशक्त लड़ाकू नेता के रूप में उभरे। उनको किसानों का भरपूर समर्थन मिला।
शिक्षक राकेश कुमार सिंह ने इनकी शहादत के बारे में बताते हुए कहा कि पांच अप्रैल 1778 को रांची जिले के सिल्ली प्रखंड के किता-लोट के जंगल से सटे स्थान पर  रामगढ़ पुलिस छावनी में हमला करने की रणनीति बना रहे थे कि अंग्रेजी सिपाहियों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा कर रघुनाथ महतो सहित दर्जनों देश भक्तों को मौत के घाट उतार दिया।इस तरह वे अपनी शहादत को प्राप्त हुए।इन्होंने बताया कि इनकी एक प्रतिमा रांची के नीमडीह में स्थापित की गयी है।ऐसे अमर शहीद को हम आज नमन करते हैं।मौके पर मंटू सिंह पटेल,धर्मेन्द्र सिंह,कमलेश सिंह,सोनू कुमार,प्रकाश कुमार,कवि जी,रामानंद सिंह,सहित कई लोग उपस्थित थे।