सावित्रीबाई फुले : शिक्षा, समानता और संघर्ष की अमर विरासत

नीरज कुमार।

दैनिक खोज खबर/मढ़ौरा (सारण)। 3 जनवरी 1831 को जन्मी सावित्रीबाई फुले केवल भारत की पहली महिला शिक्षिका नहीं थीं, बल्कि वे जाति व्यवस्था, पितृसत्ता और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध खड़ी एक सशक्त वैचारिक क्रांति थीं। नौ वर्ष की अल्पायु में उनका विवाह ज्योतिराव फुले से हुआ। उस समय जब स्त्रियों की शिक्षा की कल्पना भी सामाजिक अपराध मानी जाती थी, तब सावित्रीबाई की सीखने की रुचि को पहचानकर ज्योतिराव फुले ने स्वयं उन्हें पढ़ाना आरंभ किया। यह संबंध केवल पति-पत्नी का नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य, सहयात्री और सामाजिक परिवर्तन के साझेदारों का संबंध था। सावित्रीबाई ने अहमदनगर और पुणे से शिक्षण-प्रशिक्षण प्राप्त किया और 1848 में ज्योतिराव फुले के साथ मिलकर पुणे में लड़कियों के लिए पहला स्कूल खोला। यह कदम मात्र एक शैक्षणिक पहल नहीं था, बल्कि ब्राह्मणवादी जाति व्यवस्था और पुरुषसत्तात्मक सामाजिक ढांचे पर सीधा प्रहार था। उनका पढ़ना और पढ़ाना, दोनों ही शोषणकारी व्यवस्था के लिए चुनौती बन गया। इस चुनौती के कारण सावित्रीबाई को अमानवीय अत्याचारों का सामना करना पड़ा। कट्टरपंथी ताकतें उन्हें रोकने के लिए कभी उन पर गोबर और पत्थर फेंकतीं, कभी रास्ता रोकतीं और कभी उन्हें घर से बाहर निकाल देतीं। लेकिन सावित्रीबाई ने हार नहीं मानी। वे रोज़ एक अतिरिक्त साड़ी साथ लेकर निकलतीं, ताकि अपमान सहकर भी कक्षा तक पहुँच सकें। उनका संघर्ष इस बात का प्रमाण है कि सामाजिक परिवर्तन का रास्ता कभी आसान नहीं होता। कहा जाता है कि एक अच्छा शिक्षक वही हो सकता है जो स्वयं एक अच्छा विद्यार्थी हो। सावित्रीबाई इस उक्ति की जीवंत मिसाल थीं। वे निरंतर समाज में व्याप्त असमानता, उत्पीड़न और अन्याय को समझतीं और उसे तोड़ने के लिए स्वयं को झोंक देतीं। उन्होंने अपने विद्यार्थियों को भी केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की चेतना से लैस किया। उनका कक्षा के भीतर और बाहर का जीवन एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ था। सावित्रीबाई फुले का संघर्ष शिक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने विधवा विवाह के समर्थन में आजीवन प्रयास किए, अनाथ बच्चों के लिए आश्रय गृह खोले और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध लगातार हस्तक्षेप किया। 1876 और 1879 के भीषण अकाल तथा 1897 के प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने गाँव-देहात में राहत शिविर चलाए, भोजन और इलाज की व्यवस्था की। प्लेग पीड़ितों की सेवा करते हुए वे स्वयं इस बीमारी की चपेट में आ गईं और 10 मार्च 1897 को उनका निधन हो गया। उनका जीवन और मृत्यु दोनों ही मानवता की सेवा का उदाहरण हैं। सावित्रीबाई के शिक्षा दर्शन के केंद्र में ‘समाज सुधार’ था। वे मानती थीं कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि सामाजिक अन्याय को समझने और बदलने की क्षमता विकसित करना है। इसी कारण उन्होंने आर्थिक स्वतंत्रता के लिए व्यावसायिक शिक्षा और मानसिक स्वतंत्रता के लिए आलोचनात्मक, तार्किक शिक्षा पर बल दिया। ऐसी शिक्षा जो उत्पीड़न के स्रोतों की पहचान करना सिखाए और बदलाव के रास्ते खोजने की शक्ति दे।

स्त्री-पुरुष संबंधों में बराबरी सावित्रीबाई के विचारों का महत्वपूर्ण आधार था। वे महिलाओं के निर्णयों का सम्मान, बच्चों के लालन-पालन में पुरुष-स्त्री की समान सहभागिता और आपसी सम्मान को अनिवार्य मानती थीं। उनके लिए सभी बच्चों की शिक्षा ‘सार्वभौमिक अधिकार’ थी। उनका विश्वास था कि संवेदनशील, तार्किक और समाज-सुधारवादी शिक्षा पाने का अधिकार हर बच्चे को है, चाहे वह किसी भी जाति, वर्ग या लिंग का हो। तर्क और करुणा, न्याय और प्रेम—इन सभी को एक साथ साधने वाली सावित्रीबाई फुले ने जीवन के अंतिम क्षण तक न सहानुभूति छोड़ी, न न्याय और न ही मानव प्रेम। वे इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि समाज से कटकर कोई प्रगतिशील नहीं बन सकता। सावित्रीबाई फुले आज भी हमें सिखाती हैं कि शिक्षा तब तक अधूरी है, जब तक वह बराबरी, गरिमा और इंसानियत की लड़ाई से जुड़ी न हो।