संस्कृत एवं संस्कृति सेक्युलर राजनीति की हुई शिकार

संस्कृत शिक्षक करेंगे नोटा का प्रचार

राणा परमार अखिलेश, छपरा (सारण)
सिर्फ बिहार ही क्यों? पूरे देश में संस्कृत व संस्कृति सेक्युलर व वामपंथी राजनीति का शिकार बन कर दमतोड़ रही है। आज जहाँ अमरीका जैसे राष्ट्र के संसद सत्र का श्रीगणेश संस्कृत के स्वस्तायण शांति पाठ हो रहा है और पश्चिमी देशों में संस्कृत शिक्षकों की मांग है वहीं संस्कृत अध्ययनार्थी कम होते जा रहे हैं । आंग्ल माध्यम से निजी विद्यालयों की संबद्धता पाने की होड़ सीबीएसई बोर्ड हो रही है। तो कहीं वोट बैंक की राजनीति के तहत मदरसों की संख्या भी बढ़ रही है।स्वतंत्रोत्तर भारत में संस्कृत के कतिपय विश्वविद्यालय संस्कृत व संस्कृति के ध्वजवाहकों ने आवश्यक श्रीगणेशित की। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय तो केन्द्रीय विश्वविद्यालय है। संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी, जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह द्वारा स्थापित रणवीर संस्कृत महाविद्यालय, वाराणसी, लालबहादुर संस्कृत विश्वविद्यालय, दिल्ली कतिपय संस्कृत व संस्कृति के ध्वजवाहकों में शुमार है। महाराजा कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालय के अलावा बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल में संस्कृत विश्वविद्यालय शायद ही हों। हाँ विश्वविद्यालयों से लेकर विद्यालयों में संस्कृत एक विषय के रूप में जरूर पढाई जाती है।वह भी ऐच्छिक रूप में ।
जहाँ तक बिहार का प्रश्न है ? स्मरण रहे कि संस्कृत में शपथ लेनेवाले सरदार इंदर सिंह नामधारी थे,जिन्होंने 1990 में बिहार विधानसभा में शपथ ली धी। सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने डिग्री काॅलेजों से माध्यमिक शिक्षा को अलग कर बिहार इंटरमीडिएट परिषद का गठन तो कर दी किंतु 2005 तक वह अध्यादेश पर ही चलता रहा । उसी के समानांतर संस्कृत शिक्षा बोर्ड भी प्रकाश में आया । इंटर काॅलेजों व डिग्री काॅलेजों की भरमार के साथ संस्कृत विद्यालयों की संख्या बढने लगीं । बिहार मदरसा बोर्ड भी प्रकाश में आया और मदरसे संस्कृत से अधिक आगाज हुए । किंतु ‘न्याय के साथ विकास’ का राजग सरकार का नारा संस्कृत व संस्कृति के साथ अबतक न्याय नहीं कर पायी है। इन्फ्राएक्टक्चर विद्यार्थियों व अध्यापकों की संख्या की समीक्षा, अवलोकन और संस्तुति तक चुनावी बैतरणी पार करती रही सरकारें ।
बिहार संस्कृत शिक्षक एवं शिक्षकेत्तर कर्मचारी महासंघ कागजी घोड़ों से भी तेज दौड़ते रहे किंतु मदरसों को बिना हींग फिटकरी का रंग चोखे रहे। महासंघ के प्रदेश अध्यक्ष पंडित प्रद्योत कुमार मिश्र ने बताया कि अबतक मात्र 521 संस्कृत विद्यालयों को प्रस्वीकृति मिली है ,जबकि 3328 मदरसों को प्रस्वीकृति मिल चुकी है। 417 संस्कृत विद्यालयों की प्रस्वीकृति नितीश-सरकार के ठंडे बस्ते में है और 2209 मदरसों को प्रस्वीकृति मिल गयी । इतना ही नहीं मदरसों में फोकानिया में प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण छात्रों को प्रोत्साहन राशि दी गई और संस्कृत के मध्यमा व उपशास्त्री उतीर्ण मेधावी छात्र वंचित है। बहरहाल, आसन्न विधान सभा चुनाव में इस बार हम संस्कृत शिक्षक नोटा समर्थक हैं और वहिष्कार करेंगे । आश्चर्य तो तब होता है कि संस्कृत विद्यालय भी कई अल्पसंख्यक कहे जाने वालों के नाम से है ,वह भी प्रस्वीकृति से वंचित हैं । भारोपीय भाषा परिवार की जननी संस्कृत की महत्ता से अनभिज्ञ नितीश-सरकार अल्पसंख्यक मतों के लिए मदरसों की पक्षधर है ,जहाँ दीनी तालीम ही दी जाती है। जबकि संस्कृत के पाठ्यक्रमों में गणित, विज्ञान, समाजिक विज्ञान शामिल है। संस्कृत में शास्त्री उपाधि धारक व आचार्य भारतीय प्रशासनिक सेवा व भारतीय पुलिस सेवा ,रेलवे समूह तीन में है लेकिन कामिल ,आलिम और मौलवी पदवी धारक शायद ही उच्च पदों पर हों। बहरहाल, आसन्न चुनाव में यदि संस्कृत मुद्दा बना और संस्कृत व संस्कृति के ध्वजवाहकों ने नीतीश को अस्वीकारा तो परिणाम पर असर पड़ सकता है। यह अलग विषय है कि तीन तलाक़ व धारा 370 व 35 ए निष्क्रियकरण में जदयू ने विरोध किया, सदन का वहिष्कार किया किंतु मतदाता में भाग नहीं लेकर भाजपा का साथ दिया ,जिसे अल्पसंख्यक मतदाता समझ रहे होंगे । शायद मदरसों की प्रस्वीकृति उनके पक्ष में हो किन्तु संस्कृत व संस्कृति के पोषक शायद ही जदयू को पचा सकें ।