◆पुलवामा हमले की बरसी पर विशेष।

मांझी/छपरा(मनोज कुमार सिंह) : विगत के दशकों में कश्मीर पंजाब आदि आतंकवाद से ग्रस्त प्रदेशों में तिरंगे का अपमान बहुत बड़ा राजनीतिक हथियार हुआ करता था। तिरंगे के नाम पर चुनाव में हार जीत होती थीं। भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी द्वारा रथयात्रा के पश्चात जम्मू कश्मीर में तिरंगा लहराने तथा वर्तमान पीएम मोदी जी के श्री जोशी का सारथी होने की चर्चा आजकल सुर्खियों में है। तिरंगा फहराना राष्ट्र के प्रति समर्पण का प्रतीक है पर तिरंगा लहराना आजकल देश भक्ति के सबूत का पर्याय बन बैठा है। पक्ष हों या विपक्ष तिरंगे के साथ रैली निकालते हैं। धार्मिक अनुष्ठान के जुलूस में धर्म ध्वज के अलावा तिरंगा लेकर निकलना अप संस्कृति का हिस्सा बनने लगा है। मूर्ति विसर्जन में अश्लील नृत्य संगीत में भी भगवा झंडे से ऊंचे और बड़े बड़े तिरंगे को लहराकर लोग झूठी देश भक्ति प्रदर्शित करने का स्वांग रच रहे हैं। तिरंगा फहराने और लहराने के नियम को धत्ता बताते हुए तथाकथित देश भक्त साइकिल मोटर साइकिल और तिपहिया चारपहिया पर तिरंगा को दिन रात लहराते फिर रहे हैं। तिरंगा का स्टीकर हर वस्तु की शोभा बढ़ा रहा है। शहीदों का कफ़न होने वाला तिरंगा आम शव यात्रा का हिस्सा बनकर रह गया है।
पुलवामा में कथित रूप से जैश ए मोहम्मद के हमले में मारे गए 42 जवानों का कफ़न बना तिरंगा आज घर घर लहराया तो जा रहा है। पर पुलवामा के शहीदों को न्याय दिलाने उनके परिजनों को राहत पहुंचाने तथा घटना की निष्पक्ष जांच कराने के लिए कोई आंदोलन नही हो रहा है। क्या इसी को देशभक्ति कहते हैं। जिस देश में सौ दो सौ रुपये में लोग बिक जाते हों वहां तिरंगा क्या और पुलवामा क्या। दिल से देश भक्ति को तिलांजलि देकर और दिखावे के लिए हाथों में तिरंगा लेकर आजादी के दीवानों के बलिदानों का मजाक उड़ा रहे हैं। तिरंगे का अपमान अब बन्द किया जाना चाहिए। अन्यथा आनेवाली पीढ़ी हमें कदापि माफ नही करेगी और 15 अगस्त का महत्व हास्यास्पद बन जायेगा।
जय हिन्द जय भारत।