*जयंती पर याद किये गए समग्र क्रांति के अग्रदूत साहू जी महाराज*

✍दैनिक खोज खबर के लिए कुमार विपेंद्र की रिपोर्ट
—————————————-
सीवान : पचरुखी प्रखंड के सहलौर गांव के हरिद्वार राय के आवास पर पटेल चेतना मंच के बैनर तले समग्र सामाजिक क्रांति के अग्रदूत साहू जी महाराज की जयंती मनाई गयी।बैठक को संबोधित करते हुए अधिवक्ता तरूण सिंह ने कहा कि साहू जी महाराज बहुजन प्रतिपालक राजा के रूप में जाने जाते हैं। साहू जी महाराज  जातिवादियों से संघर्ष करते हुए ऐसे बहुजन हितैषी राजा साबित हुए जिन्होंने दलित और शोषित वर्ग के दुख दर्द को बहुत करीब से समझा और उनसे निकटता बनाकर उनके मान-सम्मान को ऊपर उठाया । अपने राज्य की गैरबराबरी की व्यवस्था को खत्म करने के लिए देश में पहली बार अपने राज्य में पिछड़ों के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू की। शोषित वर्ग के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा की व्यवस्था की। गरीब छात्रों के लिए छात्रावास स्थापित किये। 
वहीं अरविंद कुमार सिंह ने कहा कि साहू जी महाराज के शासन के दौरान बाल विवाह पर ईमानदारी से प्रतिबंध लगाया गया। साहू जी महाराज ने ब्राम्हण पुरोहितों की जातीय व्यवस्था को तोड़ने के लिए अंतरजातिय विवाह और विधवा पुनर्विवाह की पहल की। साहू जी महाराज क्रांतिकारी ज्योति ज्योतिबा फुले से प्रभावित थे और लंबे समय तक सत्य शोधक समाज के संरक्षक भी रहे।
सभा को संबोधित करते हुए उमेश सिंह पटेल ने कहा कि
जब साहू जी महाराज ने देखा कि जातिवाद के कारण समाज के एक वर्ग का दमन हो रहा है।तो वे  दलित और पिछड़ी जाति के लोगों के लिए विद्यालय खोले और छात्रावास बनवाए। इससे उनमें शिक्षा का प्रचार व प्रसार हुआ और शोषित वर्ग की सामाजिक दशा बदलने लगी।
 परंतु कुछ वर्ग के लोगों ने इसका भरपूर विरोध किया। वे छत्रपति साहू महाराज को अपना शत्रु समझने लगे। सही मायने में वे देश में आरक्षण के जनक थे।वे 1902 के मध्य में साहू जी महाराज ने गैरबराबरी को दूर करने के लिए देश में पहली बार अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की। एक आदेश जारी कर कोल्हापुर के अंतर्गत शासन-प्रशासन के 50 प्रतिशत पद पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षित कर दिये। 
वहीं कमलेश सिंह ने कहा कि साहू महाराज ने सिर्फ आरक्षण ही नहीं लागु किया अपितु उन्होंने पिछड़ी जातियों समेत समाज के सभी वर्गों के लिए अलग-अलग सरकारी संस्थाएं खोलने की पहल की।यह अनूठी पहल थी उन जातियों को शिक्षित करने के लिए, जो सदियों से उपेक्षित थीं, इस पहल में दलित-पिछड़ी जातियों के बच्चों की शिक्षा के लिए ख़ास प्रयास किये गए थे। वंचित और गरीब घरों के बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने आर्थिक सहायता उपलब्ध कराई। साहू जी महाराज के प्रयासों का परिणाम उनके शासन में ही दिखने लग गया था। साहू जी महाराज ने जब देखा कि अछूत-पिछड़ी जाति के छात्रों की राज्य के स्कूल-कॉलेजों में पर्याप्त संख्या हैं, तब उन्होंने वंचितों के लिए खुलवाये गए पृथक स्कूल और छात्रावासों को बंद करवा दिया और उन्हें सामान्य छात्रों के साथ ही पढ़ने की सुविधा प्रदान की।
अंत में शिक्षक राकेश कुमार सिंह  कहा कि  साहू महाराज जी ने 15 जनवरी, 1919 के अपने आदेश में कहा था कि- उनके राज्य के किसी भी कार्यालय और गाँव पंचायतों में भी दलित-पिछड़ी जातियों के साथ समानता का बर्ताव हो, यह सुनिश्चित किया जाये। उनका स्पष्ट कहना था कि छुआछूत को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा। उच्च जातियों को दलित जाति के लोगों के साथ मानवीय व्यवहार करना ही चाहिए। जब तक आदमी को आदमी नहीं समझा जायेगा, समाज का चौतरफा विकास असम्भव है। 15 अप्रैल, 1920 को नासिक में छात्रावास की नींव रखते हुए साहू जी महाराज ने कहा था कि- जातिवाद का का अंत ज़रूरी है. जाति को समर्थन देना अपराध है। हमारे समाज की उन्नति में सबसे बड़ी बाधा जाति है।महाराज ने पुनर्विवाह को क़ानूनी मान्यता दी थी। 
वहीं जयप्रकाश सिंह ने कहा कि साहू जी का समाज के किसी भी वर्ग से किसी भी प्रकार का द्वेष नहीं था। साहू महाराज के मन में दलित वर्ग के प्रति गहरा लगाव था। उन्होंने सामाजिक परिवर्तन की दिशा में जो क्रन्तिकारी उपाय किये थे।सही मायनों में वे समाज के अग्रदूत थे।उक्त सभा में अनिल कुमार सिंह,राजीव कुमार,ललन सिंह,शशिभूषण प्रसाद,धर्मेंद्र सिंह,चंद्रीका प्रसाद,रामाशीष सिंह,बबलू सिंह,मंटू सिंह पटेल समेत दर्जनों लोग उपस्थित थे।