भूले बिसरे : ….. जब महाराजगंज से पहली बार हार गए थे प्रभुनाथ

विनीत कुमार, छपरा

वर्ष 2009 का समय था. चुनावी तैयारियां पुरे परवान पर थीं. ताबड़तोड़ चुनाव प्रचार में सभी नेता लगे थे. चुनाव प्रचार की समाप्ति के महज दो दिन पूर्व एकमा विधानसभा के अंतर्गत आनेवालेजज साहब के मैदान में राजद सुप्रीमो लालू यादव का कार्यक्रम आयोजित हुआ.
आप समझ सकते हैं कि 2009 में लालू यादव की क्या स्थिति रही होगी. तय समय से करीब दो घण्टे बाद लालू यादव का हेलीकॉप्टर एकमा के आसमान में दिखने लगा. जैसे जैसे आसमान में हेलीकॉप्टर घड़घडता वैसे ही एकमा व आसपास के लोगों के कदम जज साहब के मैदान की ओर बढ़ते चले गए. लालू के हेलीकॉप्टर उतरने से पहले ही जज साहब का मैदान पुरी तरह पैक हो गया.

हेलीकॉप्टर से लालू उतरे, उनके साथ एक गवैया था.मंच से तब कई नेता भाषण दे रहे थे. लालू मंच पर आए. तब महाराजगंज से राजद प्रत्याशी उमाशंकर सिंह थे. उन्होंने लालू यादव का स्वागत किया व मंच तक ले आये. इसके बाद गवैये ने गाना शुरू किया और खूब समा बाँधा. इसके बाद लोगों के विशेष आग्रह पर एक और लोकगीत प्रस्तुत किया गया.
अब बारी लालू की थी. अपनी बातों से लोगों को हंसा कर लोटपोट करने में माहिर लालू ने पहले लोगों का दिल जीता फिर उमाशंकर बाबु के साथ हाथ जुड़ाकर लालू ने जनसमूह से कहा : “जे भइल से भइल अबकिर एकदम उमाशंकर जी के जीता देवे के बा, इंहा के नाम एक नम्बर पर बा, आ ई एके नम्बर पर रहे के चाही, ठीक नु.” बस लालू का इतना कहना था और जनता ने तालियों की गड़गड़ाहट से ये बता दिया कि इसबार वोट कँहा जाएगा.

मैं इस कार्यक्रम में था. यहाँ के कार्यक्रम के बाद हवा बदल गयी. एक समय तक अजेय दिख रहे प्रभुनाथ यही चुनाव हार गए. लालू मेला लूट ले गए और प्रभुनाथ की टीम इसे हल्के में ले रही थी. तब किसी प्रभुनाथ समर्थक ने मुझसे इस कार्यक्रम के बारे में पूछा, अनायास मैंने कह दिया कि लड़ाई हार गए आपलोग. बस अब कोई जीता पायेगा तो वो नीतीश कुमार हैं. लेकिन उन नेताजी ने इस बात को इस कान से सुना और उस कान से निकाल दिया.

इस कार्यक्रम के तीसरे दिन वोटिंग थी. वोटिंग के दौरान जोरदार तरीके से लोगो ने अपना मत दिया. बिल्कुल कांटे की टक्कर थी मगर प्रभुनाथ के कार्यकर्ता गलत फीडबैक नेताजी को देते रहे. वोटिंग के दिन ही किसी बाजार पर शायद मांझी बाजार पर कुछ नेता मिले. चुनाव के बारे में पूछा तो मैंने कह दिया कि इस बार हार जाएंगे प्रभुनाथ तो उनका जवाब था कि कम से कम डेढ़ लाख से हमलोग जीत रहे हैं, आपका आंकलन फेल है.

मतगणना की तारीख आयी. तय समय पर मतगणना प्रारम्भ हुआ. और अंततः महाराजगंज के महाराजा का अभेद्य किला ढह गया. इस किले को गिराया राजद प्रत्याशी उमाशंकर सिंह ने. तब प्रभुनाथ सिंह नीतीश कुमार की तीर छाप से लड़े थे. लोग कहते है कि काउंटिंग के दिन कुछ निजी चैनल ने पहले तो प्रभुनाथ के जीत की खबर चला दी थी मगर बाद में जीत उमा बाबू की हुई.

प्रभुनाथ पहली बार महाराजगंज से लोक सभा चुनाव हारे. उनके इस हार में सूत्रधार कोई और नही सारे अपने ही थे. आमतौर पर महाराजगंज में ये बात कही जाती है कि जितना किसी का वोटर नही होगा उतना प्रभुनाथ का कार्यकर्ता होगा. जोश व जुनून से लबरेज कार्यकर्ताओं की टोली होने के बावजूद भी प्रभुनाथ हार गए क्योकि उनकी टीम वस्तुस्थिति का सही आकलन नही कर पाई, यदि कर भी पाई होगी तो सम्भवतः सही फीडबैक प्रभुनाथ तक नहीं पहुँच सका होगा और वो हार गए.
ये याद रखिये चुनाव जीतते या हारते नेता ही है लेकिन चुनाव लड़ता आपका कार्यकर्ता है. इस बार भी कार्यकर्ताओं ने जोरदार तरीके से चुनाव लड़ा मगर प्रभुनाथ के अपने लोगो ने उनकी नैया डूबा दी. जबरदस्त भितरघात हुआ प्रभुनाथ के साथ और वो चुनाव हार गए.
पुनः याद दिला दे कि इस हार का मुख्य कारण अपनो का भितरघात व लालू यादव की जज साहब की मैदान में वो सभा थी. चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में बड़े नेता का कार्यक्रम यदि जम जाता है तो समझिए कि बाजी पक्ष में आ जाती है. लालू उमाशंकर जी के लिए वो काम कर गए मगर प्रभुनाथ की टीम इस बात का अनुमान तक नही लगा सकी क्योंकि उनकी टीम आश्वासत थी कि चुनाव डेढ़ लाख से जीत रहे हैं. और अंततः उमाशंकर सिंह ने प्रभुनाथ सिंह को 2797 मतों से पराजित किया व महाराजगंज के नए महाराज बने.

(2009 में उमाशंकर सिंह को कुल 211610 जबकि प्रभुनाथ सिंह को 208813 मत मिले थे.)