बिहार.अर्थोपार्जन का साधन नहीं, ब्यवस्था के संतुलन का माध्यम है पत्रकारिताछपरा। तन मन धन समर्पित कर आजादी की लड़ाई को धारदार तरीके से पेश करने की पत्रकारों की परिपाटी हुआ करती थी। लंबी लड़ाई के बाद भारत आजाद हुआ। हमने विश्व की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक सत्ता की स्थापना की। तब के पत्रकारों का नाम बड़े ही आदर व सम्मान के साथ लिया जाता है। आजादी मिलने के साथ ही सत्ता संतुलन बनाये रखने के उद्देश्य से सरकारों ने बदलते परिवेश में मीडिया संस्थानों पर शिकंजा कसना शुरू किया। आजादी का आठवां दशक पत्रकारिता के लिहाज से सर्वाधिक उतार चढ़ाव भरा रहा अथवा यों कहें उधेड़बुन के दौर से गुजर रहा है। कई बुद्धिजीवी कहते हैं कि अखबार पहले छप कर बिकते थे बाद में बिक कर छपने लगे और अब तो यहां तक कहा जाने लगा कि बिके हुए पत्रकारों के दम पर सौदे के बाद खबरें छपती हैं। चौंकिए नही ये वक्तब्य उन लोगों के हैं जिनको पत्रकारिता का एबीसीडी तक नही आता। आइये मैं बताता हूँ पत्रकारिता न तो किसी की जागीर रही है और न ही किसी के हाथों की कठपुतली। याद रहे अच्छे बुरे के संतुलन में थोड़ा अंतर आ सकता है पर पत्रकार अपना जमीर बेचकर पत्रकार कहाँ रह जाता है। माना कि पत्रकारिता के खरीददार असंख्य हैं पर क्या किसी जीवित ब्यक्ति के निधन की खबरें अरबों खरबों में भी बेच कर छापी जा सकती हैं। अथवा किसी मृत ब्यक्ति के जीवित होने की खबर पैसे के दम पर प्रकाशित करने की हैसियत किसी प्रबंधन के पास है क्या। पैसे के लालच में चापलूसी तो की जा सकती है पर सत्य अटल है उसे डिगाया नही जा सकता। पत्रकारिता सच्चाई का तराजू है। पत्रकारिता पर कोहरा का असर कुछ देर के लिए हो सकता है। सूर्योदय के साथ सवेरा होना तय है। इधर कुछ वर्षों में पत्रकारिता के मामले में लेन देन की एक नई कुत्सित परिपाटी चल पड़ी हैं। खबर छापने अथवा खबर चलाने के नाम पर उगाही करने वाली प्रजाति का अचानक उदय हुआ है। आपको बता दें कि खबर छापने और खबर चलाने के लिए प्रबंधन और मीडिया हाउस अपने प्रतिनिधियों को निर्धारित वेतन अथवा पारिश्रमिक का भुगतान खुद करता है। हाँ यह बात अलग है कि प्रबंधन अथवा मीडिया हाउस अपनी प्रसार संख्या के हिसाब से निर्धारित दर पर विज्ञापन की भी अपेक्षा रखता है। यह अवैध लेन देन नही बल्कि ब्यवसाय की कसौटी है। वर्तमान दौर में उतपन्न नई परिपाटी के तहत कुकुरमुत्ते की तरह उग आए तथाकथित पत्रकार अपने समाचार पत्र मीडिया चैनल अथवा लिंक न्यूज ग्रुप के नाम पर अवैध उगाही करते दिख रहे हैं। यह सरासर गैर कानूनी कृत्य तथा विशुद्ध रूप से अपराध है। ऐसे मामलों में लेन देन करने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने और जेल भेजने के लिए पुलिस स्वतंत्र है।पत्रकारिता तब भी और अब भी सरकार और समाज के लिए सिर्फ और सिर्फ आईना थी और है। दिल में सरकार और समाज की सेवा की भावना के बगैर पत्रकारिता निष्प्राण है। पत्रकारिता गैर कानूनी रूप से अर्थोपार्जन का साधन नही बल्कि वैश्विक स्तर पर ब्यवस्था को संतुलित रखने का माध्यम है। यह भी कटु सत्य है कि पत्रकारिता को आज तक उसका वाजिब हक सरकार तथा समाज ने नही दिया। यही वजह है कि पत्रकारिता में दिनों दिन विसंगतियां उभर रही हैं। सरकार की नीयति तथा सामाजिक सरोकारों में अनवरत हो रहे परिवर्तन को दृष्टितगत रखते हुए सम्पूर्ण भारत वर्ष में एक साथ पत्रकार सुरक्षा कानून लागू किये जाने की महती आवश्यकता है।

लेखक मनोज कुमार सिंह अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति के राष्ट्रीय प्रवक्ता है।