गोधन बाबा चलले अहेरिया, हिड़लीच बहिना देली आशीष
( नवीन सिंह परमार/ अभय शंकर  )



सीवान :हमारा ग्रामीण समाज पहले की अपेक्षा काफी बदल व आधुनिक हो गया है लेकिन आज भी समाज की कुछ पुरानी परम्पराएं है जो आज तक नही बदला ,उस में एक प्रमुख परम्परा है दीपावली के दुसरे दिन गांव व शहरों में गाय के गोबर से बनाए जाने वाला गोधन बाबा और दुसरे सुबह महिलाओ के द्वारा गाए जाने वाले गीत गोधन बाबा चलले अहेरिया, हिड़लीच बहिना देली आशीष व मुसल से गोबर निर्मित गोधन बाबा की कुटाई।
गौरतलब हो कि दिपावली के ठीक अगले दिन को मनाये जाने वाला गोवर्धन पूजा हमारे ग्रामीण संस्कृति में अपना एक अलग ही महत्व रखता हैं।इस पर्व को अन्नकूट पर्व के नाम से भी जाना जाता हैं। इसी दिन सभी औरतेँ औऱ लड़किया गाय के गोबर से गोवर्धन बना तथा फूलों से सजा कर उन्हें पूजा अर्चना की जाती हैं। समाज मे ये भी धारणा हैं कि बिना गोवर्धन की पूजा किये घर मे कोई भी मांगलिक कार्यों अर्थात शादी-ब्याह के दिन भी नहीं तय किये जाते हैं। शुक्रवार को सभी गाँवो व शहरों के विभिन्न मुहल्लों में महिलाओं के द्वारा गाय के गोबर से गोधन बाबा का निर्माण किया गया । शनिवार की अहले सुबह सभी महिलाये रेंगनी के कांट से पहले अपने सभी परिजनो को श्राप देगी व उसके बाद पुन: उनकी लम्बी उम्र के लिए दुवा करेगी उसके बाद मुसल से गोबर निर्मित गोधन बाबा को कुटेगी । इस मौके पर महिलाओ के द्वारा गाया जाने वाला लोकप्रिय व कर्णप्रिय गीत गोधन बाबा चलले अहेरिया, हिड़लीच बहिना देली आशीष हो । यह गीत काफी लोकप्रिय है और शनिवार की सुबह जिले के सभी गाँवो व शहरों में यह गीत सुना गया ।
गौरतलब हो कि शनिवार को पुरे जिले में गोवर्धन पूजा (भईया – दूज), भ्रातृ द्वितीया, यम द्वितीया और चित्रगुप्त पूजा की धूम रही। गोवर्धन पूजा के लिये अहले सुबह से महिलाओ और कन्याओं की भीड़ गली-मोहल्ले में एक दिन पूर्व से गौ के गोबर से बनाई गई भगवान गोबर्धन के आकृति चित्र के पास एकत्रित हो उन्हें रंग-बिरंगे फूलों और पत्तियो से सुशोभित कर अपने भाई की लंबी उम्र, आरोग्य आदि के लिये पूजन अर्चन किया गया। पूजन के उपरांत गोवर्धन की आकृति की मुशल आदि से कुटाई कर प्रसाद स्वरूप मिष्ठान और बज्र चना, मटर सहित अन्य अन्य के दाने एकत्रित किये गए। इस मौके पर बहनों द्वारा अपने दुलारे भाइयो को श्रापित करते हुये रेंगनी के कांट से अपने जिव्हा का छेदन किया गया और भाइयो को बज्र चना (बजरी) खिलाया गया।

इस सम्बन्ध में हसनपुरा प्रखंड के अरण्डा निवासी पंडित वरुण मिश्र ने बताया कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष के द्वितीय तिथि को गोवर्धन पूजन कर यम को खुश करने के लिये बहने अपने भाइयो को श्राप देती है और पुनः पश्चाताप में रेंगनी के कांटे से अपने जिव्हा का छेदन कर गोधन का गोबर अपने घर ले जाकर उसका 1 माह तक पूजन करती है और रूद्र पीडिया को रूद्र व्रत धारण कर प्रातः काल में गांव के ताल-तलैयो, सरोवरों और नदियो में पीडिया को प्रवाहित कर भाई की लंबी उम्र, समृद्धि और आरोग्य सुख की कामना भगवान शिव से करते हुये चुडा और गुड़ का प्रसाद वितरण करती है। अर्थांत दो पख की इस समयावधि में विष्णु का मिलन शिव से और पुनः शिव का मिलन विष्णु से होता है। गोवर्धन पूजा के उपरांत अल्प मांगलिक कार्यो को शुभारंभ होता है। जबकि नौ दिन बाद दैव प्रबोधनी एकादशी से पूर्ण मांगलिक कार्य अर्थात शादी-विवाह का कार्य प्रारंभ होता है।