
सिसकती मां की गोद में केएमसी ने भरी खुशियां
- घर पर सुरक्षित नवजात देखभाल की विधियों ने बच्चे में भरी जान
- फॉलोअप कर की गई लगातार निगरानी
बेतिया। 23 अगस्त
एक मां जब बच्चे को जन्म देती है तो उसके साथ उसकी आशाएं जुड़ी होती है, पर जब उसकी गोद की किलकारी धीमी पड़ जाए तो जाहिर है मां को चिंता होगी ही। ऐसी ही एक मां गिद्धा गांव की कलिमा खातून हैं। जिनके घर में दूसरी खुशी तो आई पर उसका कम वजन, जन्म के समय न रोना और ठीक से स्तनपान न कर पाना उसके स्वास्थ्य के लिए आफत था। बहुत सारे उपचार के बाद भी जब कोई राहत महसूस नहीं हुआ तो केयर के ब्लॉक प्रबंधक विनय कुमार तिवारी और सीभीसी मनोज ओझा के द्वारा शिशु के दादी को दी गयी कंगारु मदर केयर और आवश्यक सुझाव ने सिसकती मां की गोद सूनी होने से बचा ली।
जब जोर से हिचकियां लेने लगा नवजात
कलिमा कहती है मेरे बच्चे का जन्म गर्भकाल के 38 वें हफ्ते में हुआ। जन्म के समय मेरे बच्चे का वजन मात्र 1710 ग्राम था। जन्म के समय जब बच्चा नहीं रोया तो एएनएम के द्वारा एनबीसीसी में रेफर किया गया जहाँ उसे अम्बु ( कमजोर नवजात में इलाज की एक प्रक्रिया ) दिया गया। जब उससे भी बात नहीं बनी तो चिकित्सा पदाधिकारी ने बेतिया रेफर कर दिया। परिजनों ने वहां नहीं ले जाकर एक नीजी नर्सिंग होम में लेकर चले गए। वहां से जिस दिन डिस्चार्ज किया गया उसी दिन शाम को नवजात ने जोर से हिचकी लेना शुरु कर दिया और दूध पीना भी बंद कर दिया। फिर एक नीजी डॉक्टर ने यह कह दिया कि अब यह कम दिन का ही मेहमान है। यह सुन मेरे यहां सभी रोने बिलखने लगे। इसी बीच पहले दिन के भ्रमण के लिए केयर के मनोज कुमार ओझा जी आए।
कंगारु मदर केयर की मिली सलाह
कलिमा खाातून कहती हैं कि पहले दिन जब मनोज कुमार आए तो उन्होंने मेरी सास को घर पर ही विशेष देखभाल की जानकारी दी। जिसमें स्तनपान का प्रयास जारी रखना, कंगारु मदर केयर, नहलाने से बचना, तेल की मालिस न करना, स्वच्छता का ख्याल रखने जैसी सावधानियां बतायी। इन सभी बातों से शिशु में सकारात्मक बदलाव दिखा। 18 अगस्त को चनपटिया के चिकित्सा पदाधिकारी डॉ प्रदीप कुमार से दिखा कर चिकित्सकीय सलाह भी दिलाई। सीभीसी मनोज ओझा कहते हैं कि अब बच्चे की श्वसन दर 60 के आस-पास, त्वचा का रंग गुलाबी, नाभी सूखी हुई थी और बच्चा भी पहले से ज्याद सक्रिय दिखा।




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