सिंह चढलऽ देवी गरजत आवे दइतन के करे संहारऽ हो

ग्रामीण चौपालों शिवालयों से लेकर चौक चौराहों तक रंग गुलाल से हो रहे सराबोर

लोक संस्कृति व लोक परंपराओं के अलबम में होली की सामायिकी भूतकालीन के रंगीनी में वर्तमान व भविष्य की रागिनी के सम में टेक लगाती हुई, तीव्रता व क्षिप्रता में गतिशील है। बाजार वाद के बहिरंग को स्वीकार व वहिष्कार के बीच’ होली की गायन का कोरस’सिंह चढल देवी गरजत आवे दइतन के करे संहारऽ हो लालऽ दइतन के करे संहार – बहरहाल, समरसता सर्वरंगी बन लोक जीवन को दो दिनों तक सदाबहार रखती है,होली।

पौराणिकता व ऐतिहासिकता: हिरण्यकाश्यक बनाम प्रहलाद के वैचारिक संघर्ष सत्याग्रह व दुराग्रह व पूर्वाग्रह की परिणति होलिका दहन से श्री गणेशित यह पर्व चारों युग  व चारों वर्ण व आश्रम का उद्दीपन विभाव रहा है। मुगलकाल में बादशाह अकबर की होली का रंग दिलकशी फजां का नजीर रहा है’एक ओर खेलें कुँवर कन्हैया,अकबर टोपी लाल हो।’

बहादुर शाह जाफर व नवाब वाजिद अली शाह तक रंगों के इस त्योहार में रंगोली में रंगरेली करते मशरूफ रहे। आजादी के पूर्व सभी देशी रियासतों ताल्लुको ,ठिकानों के दरबारों में होली की रिवायत को खास तवज्जो मिला। प्रथम राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम में बिहार केशरी नरनाहर बाबू कुंवर सिंह का केशरिया होली भोजपुरी जन पदों का का कंठ हार है:आहोऽबाबू कुँवरसिंह तेगवा बहादुर ऽ बांग्ला पर उडताऽ अबीरऽ हो।

बसंत पंचमी से ही होली का रंग रंगीन करने लगता है तन-मन को: बाबा विश्वनाथ ,बाबा कीनाराम से लेकर बाबा धर्मनाथ शिलानाथ बाबा हरिहर नाथ होली के रंग में भंग ठंढई में मस्ती में झूमने लगते हैं ‘सोनपुर में रंग लूटे बाबा हरिहर नाथ। फिर सर्वेश्वरी अनादि शक्ति आदि शक्ति माँ हिंगलाज से लेकर बगलामुखी वैष्णवी अम्बिका भवानी कालरात्रि सर्वमंगला व छिन्नमस्तिका तक नौ रंगों में नव संवत् का शंखनाद करती है।

कोरस गायन है व्यास शैली का:होली गायन कोरस है, सुर व टेक के साथ ताल खेमटा कहँरवा व दीपचंदी के साथ लोक संस्कृति के अनुसार राग वृंदाबन व थाटों का संगीत शास्त्रीयह विधान एकहरी व दोहरी गायन विधान्तर्गत होता आ रहा है। भोजपुरी लोक सांगीतिक व्यास शैली के आचार्य बाबू वीरेन्द्र सिंह वीरेन्द्र सिंह धुरिआन ,गायत्री ठाकुर की परंपरा की अक्षुण्णता रखते हुए ठाकुर उदय नारायण सिंह होली की विधा फगुआ व फगुई को नये उन्माद में अभिनेता सामंजित कर रहे हैं ।

फगुआ गायन मंडलियां: –तीन दशक पूर्व सभी अंचलिक क्षेत्रों में कीर्तन मंडलियों का अस्तित्व था। सामाजिक आर्थिक सहयोग से ढोलक तासा झाल हुर्का तबला पखावज दूरी सफेदा तक क्रय किए जाते थे।

बसंतपंचमी के ताल  उठते के बाद करीब करीब बसो के दरवाजे पर फगुआ होता था। मुख्यगायक व्यास के स्वर को सजिन्दे व झलकुटिए टेक देते हुए धमार पर ताल गिरेत बोलो सियावर रामचंद्र शंकरजी भजो पर विराम देते थे। दोहरी गायन में रसिया तिलाना फगुई तबले के त्रिकिट व सारंगी पर सा री री री में रंग बह बह उठती थी।

होलिका दहन के साथ कूदि परे जमुना में लडिका हो गोपाल ऽ के साथ धुरखेली सुबह से कांदो फिर रंग और दोपहर से रात्रि 12बजे तक होली गाकर नदी जल से शीतली करण के बाद चैता के श्री गणेश से संपन्न होता है रंगों का पर्व।

बाजारवाद से विलुप्तिकरण के कागार पर होली :होली गायन की लोक परंपरा करीब करीब 90प्रतिसाद लुप्त होली चुके हैं, गाँव की मंडलिया समाप्ति के करीब है ।ऑडियो वीडियो पर सुने व देखे जाफर रहे अलबम लोक मार्यादा के प्रतिकुल है। मनोज तिवारी मृदुल रामेश्वर गोप की गायन शैली में नवीन प्रभाव तो है मगर,परंपराओं  पर संगीत शास्त्रीयता अपेक्षित है ।

साभार :अखिलेश परमार