संत परम्परा का अनमोल धरोहर-उदासी सम्प्रदाय का नागा बाबा मंदिर-एक उद्धारक की राह निहारता माँझी(सारण)।-जिसने अपने गर्भ में ना जाने इतिहास की कितनी सारी कहानियों को संजोये रखा है,जिसकी ज्वलन्त बानगी है-नागा बाबा का मंदिर।यह मंदिर हम सबों के समक्ष है पर शायद हम इसके निर्माण और उद्देश्यों से परिचित नहीं हैं।एक अनूठी और महानतम उद्देश्यों को लेकर निर्मित इस ऐतिहासिक धरोहर के विषय में प्राप्त जानकारियां कम रोचक और दिलचस्प नहीं हैं- तेरहवीं शताब्दी के आसपास माँझी संतों की साधना के लिए उपयुक्त स्थली के रूप में जग प्रसिद्ध था।सरयू की पावन धारा के समीप तब कई साधक अपनी साधना में लीन थे।इसी दौर में भारत के पश्चिमी क्षेत्र से इस्लाम के प्रवेश के बाद उत्तरी भारत में धर्म परिवर्तन अपनी चरम पर था। ऐसे में संतों के सुरक्षार्थ एक कल्पना धरातल पर उतरी,जिसे नागा नाम दिया गया।ये लोग निष्काम भाव से अपना जीवन धर्म की रक्षा हेतु समर्पित करते थे।इनका काम वैसे संतों को सुरक्षित रखना था,जो धर्म कार्य में लिप्त थे।नागाओं के लड़ने और इस्लामीकरण से बचाने के प्रयास अद्भुत थे।ये अचानक हजारों की संख्या में धावा बोलकर आक्रान्ताओं पर टूट पड़ते थे और उन्हें या तो मार डालते थे या खदेड़ आते थे।राष्ट्रीय स्तर पर तब नदियों के तट पर नागाओं के रहने,उनके ठहराव की व्यवस्था भी की गई ताकि वे आराम भी कर सकें और सुरक्षा भी दे सकें।

इसका संचालन-उदासी सम्प्रदाय-के द्वारा होता था और आज भी होता है।यह सम्प्रदाय भारत के स्वीकृत अखाड़ों में से एक है।ये गुरु नानक के ग्रंथों की उपासना करते थे।
माँझी भी इस्लामिक आक्रांताओं से अछूता नहीं था। ऐसे में यहां भी इस मठ की तब स्थापना की गई। कालान्तर में यह नागा बाबा के मठिया के नाम से जाना जाने लगा।उन दिनों ऐसे नागाओं के देखभाल की जिम्मेदारी स्थानीय शासकों में सेनापतियों,जमींदारों की थी। समय बदला और देश ने अनेक दिन देखे। मठिया तो रह गये पर देखभाल में कमियाँ आईं।नागाओं के मठ की एक अटूट श्रृंखला सारण जिले में आज भी विद्यमान है,जो निरंतर देखभाल के अभाव में निष्प्राण और निष्प्रभावी हो गये हैं। माँझी के श्मशान घाट पर अवस्थित नागा बाबा का मठिया भी अपनी विरानगी पर रो रहा है। एक स्वर्णिम इतिहास,जो कालखंड में अपनी पहचान खोने-खोने को है। यह अपने उद्धारक की तलाश में है।
यहां अखंड अष्टयाम अथवा भजन कीर्तन तो आयोजित होते हैं पर बरसात में स्थिति नारकीय हो जा रही है।महंत प्रेम दास जी,जो वर्त्तमान में इस मठ में सेवाभक्ति में तत्पर हैं,उन्होंने जो इस मठिया की स्थिति बताई है,वह चिंतनीय है।आवश्यकता है कि इस मंदिर का पुनरुद्धार कर इसे इसकी पुरानी पहचान दिलवाई जाय।