जंग-ए आजादी, मढ़ौरा महतागाछी गोलीकाण्ड (18 अगस्त 1942)-

विवेकानंद सिंह/दैनिक खोजखबर, छपरा (सारण)/बलिया । 18 अगस्त, 1942, सावन की सोमवारी के साथ ही उस दिन नागपंचमी का त्योहार भी था। अत: मढ़ौड़ा एवम् आसपास के सभी स्त्री-पुरुष, बाल- वृद्ध आदि पूजा-पाठ करने और नाग देवता को दूध पिलाने में व्यस्त थे, लेकिन इस क्षेत्र के तमाम आन्दोलनकरी, 18 अगस्त को मढ़ौड़ा के महतागाछी में सारण ज़िला कांग्रेस कमिटी द्वारा अयोजित बहुरिया रामस्वरूप देवी, जो उन दिनों सारण ज़िला कांग्रेस कमिटी की डिक्टेटर (प्रवक्ता) थीं, की विशाल सभा की तैयारी में लगे थे। इस जनान्दोलन में क्षेत्रीय क्रांतिकारियों के साथ स्थानीय युवा छात्र भी कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे थे। जिसमें से एक थे, सारण ज़िला के ग्राम लेरुआ निवासी, रामजीवन सिंह। उन दिनों इन युवा छात्रों की गुप्त बैठकें मढ़ौड़ा मध्य विद्यालय के हेड मास्टर, मिर्ज़ापुर निवासी, रामलोचन प्रसाद सिन्हा की अनुमति से स्टेशन रोड पर स्थित स्कूल भवन में होती थी, जिसमें अमर कुमार पाण्डेय, भीष्म प्रसाद यादव, रामजीवन सिंह, तारकेश्वर सिंह, बैद्यजी आदि युवा छात्र अपनी रणनीति बनाया करते थे। 18 वर्षीय राम जीवन सिंह, मैट्रिक के विद्यार्थी थे और कांग्रेस समाजवादी पार्टी के सूर्य सिंह तथा शीतल सिंह आदि के साथ ही रहते थे। तीन भाइयों में मझले भाई रामजीवन सिंह की शादी आषाढ़ में ही हुई थी, लेकिन उन्हें पत्नी के सुख से कहीं अधिक चिंता मां भारती के दु:ख की थी, तभी तो वह युवा छात्र अक्सर भगत सिंह और चंद्रशेखर आज़ाद की ही बातें करता था और उनके ही पदचिह्नों पर चलते रहने के लिए कृतसंकल्प भी था और मां भारती ने उसके संकल्प को शीघ्र ही पूरा कर दिखाया।
स्थानीय बुज़ुर्ग बताते हैं कि 18 अगस्त को मढ़ौड़ा औरआसपास के क्षेत्र में मूसलाधार बारिश हो रही, लेकिन बावजूद इसके महतागाछी में बहुरिया रामस्वरूप देवी का भाषण सुनने के लिए दूर दराज से भारी संख्या में लोग आए थे। बारिश के बीच सभा चल रही थी, बहुरियाजी की भाषण का सार था कि कैसे स्थानीय सारण इंजीनियरिंग वर्क्स लिमिटेड की फैक्ट्री पर धावा बोलकर उसे अपने अधिकार में लिया जाए, क्योंकि वहां द्वितीय विश्वयुद्ध के प्रयुक्त होनेवाले बमों के लिए खोल का निर्माण हो रहा था। सभा प्रारम्भ होने के कुछ ही देर बाद वहां अंग्रेज़ी फ़ौज, जिन्हें स्थानीय लोग टॉमी कहते थे, की एक टुकड़ी आ गई और सभा को निरस्त करने को कहा, इसी हाथापाई में एक अंग्रेज़ टॉमी ने रामजीवन सिंह के सीने गोली दाग दी, जिसके चलते उनकी मौत हो गई। मढ़ौड़ा के माटी के लाल अमरशहीद रामजीवन सिंह की स्मृति में 1970 में मढ़ौड़ा हाई स्कूल के निकट एक शहीद स्मारक का निर्माण किया गया, जिसका उद्घाटन करते हुए बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री दारोगा प्रसाद राय ने कहा कि रामजीवन सिंह की शहादत से उपजे जनाक्रोश की गूंज लंदन की संसद तक में गूंजी थी। वर्तमान समय में इस स्मारक की देखरेख की जिम्मेदारी लालाबाबू गिरि के जिम्मे है।
यदि आप 18 अगस्त को उक्त घटना के बारे ने विस्तार से जानना चाहते हैं तो कर्णपुरा गांव के दिवंगत कवि मुहम्मद अज़ीज़, जिन्हें बिहार का कबीर कहा जाता है, की निम्नलिखित कविता अवश्य पढ़ें –
पुरूब गोला, पछिम गोला,
दखिन में शिव भोला,
उत्तर गढ़देवी पूजा होला, ओ मढ़ौड़ा में ।
जहाँ मेहताजी के घर,
उहाँ झगड़ा के जर,
इहे फइलल बा खबर, ओ मढ़ौड़ा में ।
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