*अगर ये लोग गरीब  गुरबों की पार्टी है और इनकी लड़ाई खानदानी जमींदारों से है. तो ये  जमींदार हैं कौन…?*
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✍नवीन सिंह परमार 
🍄राजनीतिज्ञ लोग दिलचस्प होते हैं, वे झूठ भी पूरे आत्मविश्वास के साथ कहते हैं और यह मानते हैं कि आत्मविश्वास के साथ कहा गया झूठ हमेशा सच मान लिया जाता है. अब जैसे लालूजी ने पूंजीपतियों की पार्टी को चुनौती देते हुए खुद की पार्टी को गरीब गुरबों की पार्टी बता दिया है.
अभी पिछले दिनों  राजगीर में राजद का  तीन दिवसीय कार्यकर्ता प्रशिक्षण शिविर आयोजित हुआ था . उस शिविर राजद के 14-15 सौ कार्यकर्ता पहुंचे हुए थे. प्रखंड स्तर के कार्यकर्ताओं की इनमें बड़ी संख्या थी. इन कार्यकर्ताओं के साथ पांच सौ से अधिक गाड़ियां भी पहुंची थी, इनमें सबसे सस्ती गाड़ी महिंद्रा की स्कार्पियो थी.जो प्रशिक्षक आये थे, वे फ्लाइट आये थे.
इस शिविर में भाषण देने वाला हर नेता के मुंह से गरीब गुरबों की पार्टी का नारा सुनाई देता. ये नेता भारतीय मीडिया को सवर्णवादी मीडिया का तगमा दे कर अपनी भाषण समाप्त करते थे.   
शिविर में सबसे दिलचस्प यह थी कि गरीब गुरबों की स्कार्पियो वाली पार्टी हम दुपहिया और पैदल चलने वाले पत्रकारों के ख़िलाफ़ क्रांति के लिये हुंकार भर रहें थें ।
शिविर में नेता लोग कह रहें थें कि हमलोग सामाजिक न्याय के शत्रु हैं, जो इन गरीब गुरबों को इनके हक से वंचित किये हुए हैं.
यह सिर्फ लालू जी की पार्टी की बात नहीं है, सत्ता सुख भोग चुकी हर पार्टी फिर वह चाहे गरीब गुरबों की पार्टी हो, आम आदमियों की पार्टी हो, दलितों की पार्टी हो, पिछड़ों की पार्टी हो या हिंदुओं की पार्टी हो, इनका छोटा से छोटा कार्यकर्ता पर्याप्त सक्षम और समृद्ध है. मगर ये इस भ्रम को जिंदा रखना चाहते हैं कि इनकी पार्टी गरीब गुरबों की पार्टी है और इनकी लड़ाई खानदानी जमींदारों से है. मगर ये जमींदार हैं कौन…?
( इनपुट: अमीत जी पत्रकार)