​पूर्व मुख्यमंत्री सह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन पर विशेष:लालू प्रसाद का व्यक्तित्व और कृतित्व

संजय कुमार सुमन 

सम्पादक@दैनिक खोज खबर 

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सह राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आज अपना 70वां जन्‍मदिन घर में परिवार के सदस्याें के साथ केक काटकर मनाया। बाद में उनके पुत्र व बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्‍वी यादव ने इसकी तस्‍वीरें सोशल मीडिया पर शेयर की  तेजस्वी यादव ने फेसबुक पर तस्वीरें शेयर करते हुए लिखा, शेर दिल, न्याय के लिए लड़ने खिलाफ लड़ने वाले, समाजवाद के गुरू, गरीबों के मसीहा लालू प्रसाद यादव जी को जन्मदिन की मुबारकबाद, पिता आप पर गर्व है।

लालू यादव के 70वें जन्मदिन पर विशेष : आलोचनाओं के बावजूद कभी भी अपने अंजाद में नहीं किया बदलाव

लालू प्रसाद यादव रविवार को 70वें साल में प्रवेश कर गए है। इस अवसर पर आज सुबह बधाई देने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी लालू यादव के निवास स्थान पहुंचे। वहां उन्‍होंने लालू प्रसाद को जन्‍मदिन की शुभकामनाएं दीं। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी लालू प्रसाद को उनके जन्मदिन की बधाई दी है।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने  उन्हें फूलों का गुलदस्ता भेंट किया तथा गले लगकर जन्मदिन की बधाई दी। लालू को बधाई देने के बाद मुख्यमंत्री ने पत्रकारों से कहा, “मैं लालू प्रसाद यादव को जन्मदिन की बधाई देने आया हूं।” उन्होंने कहा कि राजनीतिक जीवन और सामाजिक जीवन में छात्र जीवन से लेकर अब तक जो उनका (लालू प्रसाद) सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में योगदान है, वह काफी अहमियत रखता है। राजद सुप्रीमो को जन्मदिन की बधाई देने वाले अन्य प्रमुख लोगों में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे, वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी, शिक्षा मंत्री और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अशोक कुमार चौधरी, कृषि मंत्री रामविचार राय, अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री अब्दुल गफूर, पर्यटन मंत्री अनिता देवी, श्रम संसाधन मंत्री विजय प्रकाश, खान मंत्री मुनेश्वर चौधरी, उद्योग मंत्री जय कुमार सिंह, परिवहन मंत्री चन्द्रिका यादव, कला मंत्री शिवचन्द्र राम, सांसद जयप्रकाश नारायण यादव, विधायक मुन्द्रिका सिंह यादव, श्याम रजक, सुरेन्द्र यादव, शक्ति यादव, विधान पार्षद रणविजय सिंह, संजय कुमार सिंह गांधी एवं दिलीप चौधरी सहित महागठबंधन के अन्य नेता एवं कार्यकर्ता शामिल थे।

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लालू यादव का नाम जब भी लिया जाता है तो उनकी जो छवि दिमाग में बन कर आती है वो हाजिरजवाब होने के साथ साथ तेज तर्रार नेता की होती है। लालू यादव एक मसखरे की तरह अपने बोलने के अंदाज से लोगों को हंसाते भी है तो अपनी राजनीतिक कुटनीति से सबको चौंका भी देते हैं।आलोचनाओं के बावजूद लालू ने कभी भी अपने अंजाद में बदलाव नहीं किया और उनका यहीं अंदाज उनके साथ-साथ बिहारियों की पहचान बन गयी।

 

लालू यादव ने 70वें जन्मदिन पर रात 12 बजे काटा केक, सोनिया-नीतीश ने दी बधाई

जेपी आंदोलन से की थी अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत
जयप्रकाश नारायण के जेपी आंदोलन से अपने राजनीतिक कैरियर की शुरूआत करने वाले लालू यादव का जन्म 11 जून 1948 को बिहार के परिवार में हुआ था।1977 में आपातकाल के बाद हुए लोकसभा चुनाव में लालू यादव जीते और पहली बार 29 साल की उम्र में लोकसभा सांसद बनकर पहुंचे।1990 में वे बिहार के मुख्यमंत्री बने और 1995 में फिर भारी बहुमत से विजयी रहे। 1997 में लालू यादव ने जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल के नाम से नयी पार्टी बना ली थी।  गिरफ्तारी तय हो जाने के बाद लालू ने मुख्यमन्त्री पद से इस्तीफा दे दिया और अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमन्त्री बनाने का फैसला किया। जब राबड़ी के विश्वास मत हासिल करने में समस्या आयी तो कांग्रेस और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने उनको समर्थन दे दिया।

“किंग मेकर” की भूमिका में रहे लालू प्रसाद 

1998 में केन्द्र में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार बनी। दो साल बाद विधानसभा का चुनाव हुआ तो राजद अल्पमत में आ गई। सात दिनों के लिये नीतीश कुमार की सरकार बनी परन्तु वह चल नहीं पायी। एक बार फ़िर राबड़ी देवी मुख्यमन्त्री बनीं। कांग्रेस के 22 विधायक उनकी सरकार में मन्त्री बने। 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद एक बार फिर “किंग मेकर” की भूमिका में आये और रेलमन्त्री बने। यादव के कार्यकाल में ही दशकों से घाटे में चल रही रेल सेवा फिर से फायदे में आई।

भारत के सभी प्रमुख प्रबन्धन संस्थानों के साथ-साथ दुनिया भर के बिजनेस स्कूलों में लालू यादव के कुशल प्रबन्धन से हुआ भारतीय रेलवे का कायाकल्प एक शोध का विषय बन गया। लेकिन अगले ही साल 2005 में बिहार विधानसभा चुनाव में राजद सरकार हार गई और 2009 के लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी के केवल चार सांसद ही जीत सके। इसका अंजाम यह हुआ कि लालू को केन्द्र सरकार में जगह नहीं मिली। समय-समय पर लालू को बचाने वाली कांग्रेस भी इस बार उन्हें नहीं बचा नहीं पायी। दागी जन प्रतिनिधियों को बचाने वाला अध्यादेश खटाई में पड़ गया और इस तरह लालू का राजनीतिक भविष्य अधर में लटक गया।

जानिए कैसे पड़ा ‘लालू’ नाम

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव जिंदगी में कई तरह के उतार चढ़ाव देखने के बावजूद देश की राजनीति में सबसे चतुर और चालाक राजनेता माने जाते हैं। बचपन से ही लालू प्रसाद बहुत तेज थे, लेकिन गरीबी के कारण उनकी ज्यादा पढ़ाई लिखाई नहीं हो पायी थी। बचपन में लालू प्रसाद अपनी भैंस चराया करते थे।बताया जाता है कि कड़ी धूप में जब वह भैंस को चारा खिलाकर घर लौटते थे तो उनका चेहरा लाल हो जाता था।जिसे देखते हुए उनके पिता कुंदन राय ने उसका नाम लालू रख दिया। इससे पहले उन्हें प्रसाद कह कर पुकारा जाता था।

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लालू प्रसाद की एकमात्र बहन  गंगोत्री देवी ने बताया कि अन्य भाइयों की तुलना में प्रसाद के साथ उनका लगाव अधिक था। हालांकि सभी भाई उन्हें भाई सरीखा मानते थे। कहते थे कि हम छह नहीं सात भाई हैं। एक घटना का जिक्र करते हुए लालू प्रसाद यादव की बहन ने बताया कि उस दिन बाबू जी मवेशी चराने जा रहे थे। रास्ते में गांव के ही एक व्यक्ति से उनका झगड़ा हो गया। तब लालू 14-15 वर्ष के किशोर थे। झगड़े की जानकारी मिलने पर दौड़ पड़े। इस बीच वे स्वयं भी पहुंच गईं और फिर सबने मिलकर झगड़ा करने वाले उस व्यक्ति की धुनाई कर दी। तब से सभी भाई उन्हें भाई सरीखा ही मानते रहे।

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अपने भाई लालू प्रसाद की शिक्षा-दीक्षा व लालन-पालन के संबंध में पूछने पर उनकी बहन ने बताया कि बाबू जी के पास एक धुर भी जमीन नहीं थी। घर में कुछ मवेशी थे और बाबू जी तब खेतिहर मजदूर थे। इसी से घर चलता था। उन दिनों खाने के भी लाले थे। कभी मकई का दर्रा तो कभी साग-रोटी खाकर दिन गुजारना पड़ता था। भाई महावीर राय और मुकंद राय को पटना में नौकरी मिली तब जाकर स्थिति बदली। उन्होंने बताया कि उन दिनों गरीबी इतनी थी कि उनके पिता ने केवल तीस रुपए दहेज में देकर उनकी शादी गोपालगंज जिले के ही सिकटिया पंचायत के चक्रपाणि गांव में की थी।

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बोलने की शैली

लालू प्रसाद अपने बोलने की शैली के लिए मशहूर हैं। इसी शैली के कारण लालू प्रसाद भारत सहित विश्‍व में भी अपनी विशेष पहचान बनाए हुए हैं। अपनी बात कहने का लालू यादव का खास अन्दाज़ है। बिहार की सड़कों को हेमा मालिनी के गालों की तरह बनाने का वादा हो या रेलवे में कुल्हड़ की शुरुआत, लालू यादव हमेशा ही सुर्खियों में रहे। इन्टरनेट पर लालू यादव के लतीफों का दौर भी खूब चला। इनकी रुचि खेलों तथा सामाजिक कार्यों में भी रही है। 2001में वे बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के अध्‍यक्ष भी रह चुके हैं।