​*आलेख:-वट सावित्री व्रत सौभाग्य के  साथ – साथ  पर्यावरण को बचाने हेतू संकल्पित कामना*
👈चंदन कुमार झा”दैनिक खोज खबर” ,मधेपुरा👉
ज्येष्ठ मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या को वट सावित्री व्रत हर वर्ष  मनाया जाता है।  इस वर्ष में आज यह व्रत 25 मई गुरूवार को मनाया जा रहा है । यह व्रत सौभाग्य की कामना एवं संतान की प्राप्ति हेतु फलदायी माना जाता है। वट वृक्ष का पूजन और सावित्री-सत्यवान की स्मरण करने के विधान के कारण ही यह व्रत वट- सावित्री के नाम से प्रसिद्ध हुआ। वट सावित्री पूजा पिया की लंबी उम्र के लिए व्रत
सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, फल और मिठाई से सावित्री, सत्यवान और यमराज की पूजा करती है ! 
वट सावित्री व्रत का पूजन आज  विधि-विधान से पूरे उत्तर भारत में सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ के चारों ओर इस दिन फेरें लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों और उन्नति के पथ पर आगे बढ़ें। प्यार, श्रद्धा और समर्पण के इस भारत देश में यह व्रत सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी दिखाता है।
आपको बता दें कि हिन्दू धर्म में ऐसी मान्यता है कि इसी दिन मां सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। हिन्दू धर्म में वट सावित्री पूजा हिन्दू  स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है !  भारतीय हिन्दू धर्म के मान्यता के मुताबिक इसे करने से स्त्रियाँ  हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त करती है ।
सर्वप्रथम विवाहित स्त्रियाँ सुबह उठकर अपने नित्य कर्म से निवृत्त हो स्नान करके शुद्ध होकर  फिर नये वस्त्र पहनकर सोलह श्रृंगार करके  पूजन के सभी सामग्री को टोकरी अथवा डलिया में व्यवस्थित कर लेती है , तत्पश्चात वट वृक्ष के नीचे जाकर वहाँ पर सफाई कर सभी सामग्री रखकर  सबसे पहले सत्यवान तथा सावित्री की मूर्ति को निकाल कर वहाँ स्थापित करती है उसके बाद धूप, दीप, रोली, सिंदूर व नेवेद्यादि से पूजन करती है ! लाल कपड़ा सत्यवान-सावित्री को अर्पित कर तथा फल भी  समर्पित करती है ततपश्चात बाँस के पंखे से सत्यवान-सावित्री को हवा करती है ! बरगद के पत्ते को अपने बालों में लगा  धागे को बरगद के पेड़ में बाँधकर यथा शक्ति 5,11,21,51, या 108 बार परिक्रमा करती है ! इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा पंडित जी से सुनती है , उन्हें यथा सम्भव दक्षिणा देकर या कथा स्वयं पढ़कर इस विधि से हर वर्ष हिन्दू धर्म की अलख जगाने का पवित्र काम करती है ! पूजा अर्चना के बाद स्त्रियाँ  फिर  अपने-अपने घरों को लौट जाती है ! घर में आकर उसी पंखें से अपने पति को भी हवा लगाकर तथा उनका आशीर्वाद सत्यवान के रूप में प्राप्त करके उसके बाद शाम के वक्त कुछ मीठा भोजन करती है !

कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूँ और बिना पति के संतान कैसे संभव है। सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं। इसके बाद यमराज ने चने के रूप में सत्यवान के प्राण सावित्री को सौंप दिये। सावित्री चने को लेकर सत्यवान के शव के पास आयी और चने को मुंह में रखकर सत्यवान के मुंह में फूंक दिया। इससे सत्यवान जीवित हो गया इसलिए वट सावित्री व्रत में चने का प्रसाद चढ़ाने का नियम है। जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।
दूसरी तथ्य की ओर देखें तो हिन्दू धर्म में  वृक्षों की पूजा पर्यावरण की रक्षा हेतू संकल्प लेने का भी एक सुसज्जित अंस है ! इससे करोड़ों भारतीय ही नहीं विश्व के लोगों को भी प्रेरित करने का कार्य किया जाना जाता है कि पर्यावरण की रक्षा करना हिन्दूओं का ही  नहीं हर धर्म के लोगों के लिये जरूरी है ! आज विश्व में जिस पर्यावरण को बचाने की जद्दोजहद करते देखी जा रही  है वहीं वट सावित्री में वृक्षों की पूजा हिन्दू धर्म में अति प्राचीन समय से होना अपने आप में ही विशिष्टताओं में से एक है ! इसलिये हिन्दू धर्म में लोग पीपल के वृक्ष ,वरगद के वृक्ष व फुलों के वृक्षों आदि को काटकर जलाने की परंपरा नहीं   देखी जाती है ! इसे हमें आज पर्यावरण की दृष्टीकोण से भी और मजबूती से बनाये रखने की जरूरत है !