परवेज अख्तर/सिवान;
सीवान. शहर के भगवान पैलेस में हो रहे नौ दिवसीय श्रीभागवत कथा के दौरान स्वामी प्रज्ञानंद जी महाराज ने चाथे दिन भक्तों को गीता का ज्ञान देते हुए कहा कि दुखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निस्पृह क्रोध और लोभ का कारण है. जिसके रोग, राग, द्वेष और क्रोध नष्ट हो जाए ऐसे प्राणी को स्थितपज्ञ यानी स्थिर बुद्धिवाला कहा जाता है जो अपने मन में स्थित संपूर्ण कामनाओं को त्याग देता है, स्वयं से स्वयं में सदा संतुष्ट रहता है उस व्यक्ति को स्थितप्रज्ञ पुरूष कहा जाता है. महाराजजी ने कहा कि गीता में भगवान ने मनुष्यों को कर्म करने को कहा, फल की चिंता नहीं करनी चाहिए. जैसा फल चाहिए वैसा कर्म करना चाहिए. उन्होंने बताया कि जीव को पाप की ओर तीन विकार ही धकेल देते हैं. जैसे काम, क्रोध और लोभ यह तीनों मानव कल्याण के घोर शत्रु हैं. कल्याण के मार्ग पर चलने वालों को इन तीनों से दूर रहना चाहिए. संसार में मनुष्य जितना भी पाप, अत्याचार, दुराचार करता है इसी तीन शत्रु कामना, क्रोध, लोभ करवाती है.
555555555555555




Recent Comments