अनूप नारायण सिंह/पटना।बिहार में लंबे समय तक उप मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल चुके सुशील मोदी कैबिनेट मंत्री बनने की चाहत रखते थे। हालांकि उन्होंने अपनी इस चाहत को जगजाहिर नहीं किया था, लेकिन दावेदार वह भी कैबिनेट मंत्री के थे। आखिर क्या वजह है कि उन्हें भी नरेन्द्र मोदी मंत्रिमंडल से बाहर रहना पड़ा है?
केंद्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी अटल- आडवाणी से बिल्कुल भिन्न है. यह जोड़ी अच्छे- बुरा का याद लंबे समय तक रखने वाली है. बात तब की है जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. अमित शाह कोर्ट कचहरी के चक्कर में थे. कुछ कारणों से अमित शाह को गुरु से बाहर रहना था. वो पटना में रुके हुए थे.उस समय सुशील मोदी बिहार के उपमुख्यमंत्री हुआ करते थे. सुशील मोदी का कद अमित शाह से ज्यादा होता था. अमित शाह ,सुशील मोदी से मिलने का कई बार वक्त माँगा लेकिन ये नहीं मिले. दूसरी घटना तब की है, जब भाजपा और संघ के कद्दावर नेता संजय भाई जोशी को केंद्रीय नेतृत्व से किनारा किया गया था तो इन्होंने खुलकर श्री नरेन्द्र मोदी जी का विरोध किया था.
सुशील मोदी बिहार भाजपा पर दो दशक से अधिक समय तक राज किया. उन्होंने राजनीति बस नेताओं कि की, आम जनता के दिल में जगह नहीं बना पाए. अतः केन्द्रीय नेतृत्व को यह ज्ञात है कि इनके नाराज होने से वोट पर कोई असर नहीं होगा.अपने विरोधियों को कुचलते रहे और सफल भी , लेकिन विरोधियों की तादाद इतनी लंबी हो गई कि ये उनके नीचे दबते चले गए और जबतक पता चला तबतक काफी देर हो चुकी थी.
बिहार भाजपा के अंदर का विवाद भी सुशील मोदी के केन्द्र में मंत्री बनने की राह में बड़ा रोड़ा साबित हुआ। सुशील मोदी के साथ ही भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल भी केन्द्र में मंत्री बनने के लिए लगातार कोशिशें कर रहे थे। सुशील मोदी की दावेदारी को संजय जायसवाल ने एक तरह से चुनौती दे रखी थी।
सुशील मोदी की तुलना में संजय जायसवाल भाजपा के केन्द्रीय संगठन की लॉबी में ज्यादा मजबूत थे। संजय जायसवाल को ये मजबूत लॉबी भले ही केन्द्रीय मंत्रिमंडल तक नहीं पहुंचा पाई, लेकिन इस लॉबी ने सुशील मोदी को मंत्री बनने से जरूर रोक दिया। इसी आंतरिक विवाद में इस बार बिहार भाजपा के हाथ खाली रह गए हैं।