सोनू को सोने दो,बात निकली है तो दूर तलक जायेगी।
लेखक शाहिद असरफी
मशहूर सिंगर सोनू निगम को अज़ान से दिक्कत है, बक़ौल उनके कि जब मैं मुसलमान ही नहीं तो मैं अज़ान की आवाज़ से क्यों जागूँ???
बात तो आपकी सही है निगम साहब, जब अज़ान की आवाज़ से मुसलमान ही नहीं जाग रहे, जिनको जगाने के लिये ही अज़ान दी जाती है; और आपको हिन्दू होकर जागना पड़े तो ये सही नहीं है। खैर, मुसलमान अज़ान की आवाज़ से जागे या न जागे ये अलग विषय है। फ़िलहाल हम बात करते हैं आपके कथन पर कि “मैं मुसलमान ही नहीं तो मैं अज़ान की आवाज़ से क्यों जागूँ, क्या गुंडागर्दी है?”
बात आपकी सौ फीसद हक़ है कि जिस धर्म, मज़हब या पंथ में आपकी आस्था और ईमान ही नहीं उससे जुड़ी हुई उपासना पद्धति से आपको असहजता महसूस होना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है। मगर बात आती है कि ये रवैया सिर्फ धर्म विशेष के लिए ही क्यों? फिर आप जैसे फ़नकार के लिए तो ये और भी ज़्यादा अशोभनीय है क्योंकि आपकी आवाज़ और हुनर के क़द्रदान तो हर धर्म और मज़हब के लोग हैं। मेरा आपसे ये सवाल है निगम साहब कि भारत में और दूसरे धर्मों के उपासना स्थल भी हैं वहाँ पर भी माइक पर भजन, कीर्तन, अरदास, प्रवचन, दीक्षा, सत्संग, जयघोष, शंख, घँटियों और ढ़ोल-नगाड़ों की ध्वनि से माहौल में शोर शराबा और ध्वनि प्रदूषण होता है। उन सबके खिलाफ आप या कोई और कुछ क्यों नहीं बोलता?
संयोग से आपका घर मस्जिद के पास होगा जिसकी वजह है आपको ये असहजता महसूस हो रही है। मगर भारत में तो ऐसा हर गली मोहल्ले में है कि मंदिर के पास मुस्लिम का घर और मस्जिद के बग़ल में हिन्दू का घर होता है। आपसे पहले तो किसी आम भारतीय ने ऐसी कोई शिकायत नहीं की। बात अगर ये है कि कोई हिन्दू अज़ान की आवाज़ से क्यों उठे तो फिर कोई मुस्लिम, ईसाई, सिख या जैन हिन्दू मंदिर की शंखनाद, घण्टियों की आवाज़ को क्यों सहन करे? क्यों कोई आम नागरिक हिन्दू देवी देवताओं की शोभायात्राओं के दौरान होने वाले ट्रैफिक जाम को सहन करे। आप तो मुम्बई में रहते हैं, गणेश महोत्सव के दौरान सबसे ज्यादा व्यस्त रहने वाले मुम्बई की क्या दशा होती है आपको नहीं पता?? अज़ान तो मुश्किल से 5 से 7 मिनट में पूरी हो जाती है। हिन्दुओं के साल में कितने त्यौहार आते हैं, कितनी रैलियां और शोभायात्राएं निकलती है। महाआरती और सत्संग पूरे पूरे दिन और जैनियों के चातुर्मास तो पूरे चार महीने चलता है। इस दौरान 20-20 घण्टों तक माइक चालू रहता है। इन सबको कोई गैर हिन्दू या दूसरे धर्म का व्यक्ति क्यों बर्दाश्त करे?
आए दिन जागरण-कीर्तन के नाम पर, महापुरुषों की जयन्ति के नाम पर मेलों का आयोजन होता है। इन सब पर प्रशासन को कितना ख़र्च करना पड़ता है जबकि टैक्स तो सभी भारतीय चुकाते हैं। ये सारा ख़र्च तो टैक्स की रकम से ही होता है। हिन्दू त्योहारों पर सरकारी छुट्टियां कितनी होती है, दूसरे धर्मों के लोगों को उनसे कितनी असुविधा होती है? अदालतों में चलने वाले महत्वपूर्ण केसों में फंसे लोगों पर, सरकारी अस्पताल में बड़े डॉक्टर का इंतज़ार कर रहे मरीज़ों पर ये त्यौहारिक छुट्टियां कितनी भारी पड़ती है? आपने अपना बयान देने से पहले कभी सोचा?? बात चूँकि आपने हिन्दू-मुस्लिम संदर्भ में की है तो इन सब का जवाब भी देना होगा। मुसलमान तो साल में सिर्फ दो बार ईद के अवसर पर सड़क पर नमाज़ पढ़ता है लेकिन उसमें भी आम नागरिक को कोई ख़ास परेशानी नहीं होती क्योंकि ये नमाज़ सुबह दस बजे से पहले पहले अदा हो जाती है और उस वक़्त सड़कों पर यातायात दबाव बहुत कम होता है। मुस्लिम त्यौहार के नाम पर भी सिर्फ चार सरकारी छुट्टियां होती हैं। फिर मुसलमान या किसी दूसरे धर्म का मानने वाला ये सब क्यों बर्दाश्त करे???
इतना कुछ होने के बावजूद अगर आपको शांति चाहिए तो एक काम कीजिये, कोर्ट में रिट लगाइये और सभी धर्मों के ख़िलाफ़ इस तरह की पाबंदी लागू करवाइये, इंशा अल्लाह सबसे पहले मुसलमान अपनी मस्जिदों के माइक बन्द करेगा। मगर धर्म के नाम पर दोगलापन और भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।




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