भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं, बल्कि संस्कृति, संवेदना और इतिहास की संवाहक

धर्मेंद्र रस्तोगी
छपरा, 14 सितंबर।
हिंदी दिवस केवल एक औपचारिकता या वार्षिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह उस भाषा के प्रति सम्मान व्यक्त करने का अवसर है जो देश की सांस्कृतिक आत्मा को पिरोती है। आज हिंदी ने अपनी भौगोलिक सीमाओं को बहुत पीछे छोड़ दिया है। ग्लोबलाइजेशन और भारतीय प्रवासियों के प्रभाव के चलते अब यह भाषा सात समंदर पार भी पूरी शान के साथ संवाद और संस्कृति का मुख्य माध्यम बन चुकी है। दुनिया के कई देशों में हिंदी न केवल बोली और समझ जाती है, बल्कि वहां की सामाजिक और सांस्कृतिक ताने- बाने का अहम हिस्सा भी बन चुकी है।

पड़ोसी देशों और ऐतिहासिक रिश्तों का प्रभाव:
भारत के पड़ोसी देशों में हिंदी का प्रभाव सबसे गहरा है। नेपाल इसके सबसे बड़े उदाहरणों में से एक है। भौगोलिक निकटता, साझा इतिहास और गहरे सांस्कृतिक संबंधों के कारण नेपाल में हिंदी न केवल आसानी से समझी जाती है, बल्कि व्यापक स्तर पर बोली भी जाती है। रोज़मर्रा के लेन- देन, मीडिया, और व्यापारिक संवाद में यहां हिंदी का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। भारत और नेपाल के बीच की खुली सीमाएं और रोटी- बेटी का रिश्ता इस भाषा को वहां की ज़मीन से जोड़े रखता है।

इसी तरह, कैरिबियन और प्रशांत महासागर के देशों में हिंदी के पहुंचने की एक लंबी ऐतिहासिक दास्तान है। औपनिवेशिक काल के दौरान भारत से ले जाए गए गिरमिटिया मजदूरों ने अपनी मातृभाषा को इन दूर- दराज के देशों में अपनी पहचान के रूप में जीवित रखा है। फिजी में तो हिंदी का एक अनूठा रूप विकसित हुआ है, जिसे “फिजी हिंदी” कहा जाता है। यह वहां के इंडो- फिजियन समुदाय की मुख्य बोलचाल की भाषा है, जो अंग्रेजी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलती है। इसी प्रकार मॉरीशस में हिंदी को विशेष संवैधानिक और सांस्कृतिक महत्व प्राप्त है। यहां इसे राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हासिल है और देश की सांस्कृतिक पहचान तथा साहित्य में इसका योगदान अतुलनीय है।

कैरिबियन और लैटिन अमेरिकी देशों में सांस्कृतिक धरोहर
दक्षिण अमेरिकी और कैरिबियन क्षेत्र के कई देशों में आज भी भारतीय मूल के लोग अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं। त्रिनिदाद और टोबैगो, सूरीनाम और गुयाना जैसे देशों में हिंदी, विशेष रूप से इसकी उपभाषाएं जैसे भोजपुरी और अवधी, घरों और धार्मिक अनुष्ठानों में जीवित हैं। सूरीनाम में भारतीय- सूरीनामी आबादी आज भी अपनी परंपराओं के प्रति उतनी ही सजग है। इन देशों में जब रामायण पाठ, भजन या पारंपरिक विवाह होते हैं, तो हिंदी का उच्चारण हवा में घुल जाता है। यह भाषा इन समुदायों के लिए उनकी खोई हुई मातृभूमि से जुड़ने का सबसे मजबूत भावनात्मक सेतु है।

आधुनिक प्रवासन और वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र
बीते कुछ दशकों में आर्थिक अवसरों की तलाश में दुनिया के विकसित देशों में पहुंचे भारतीय प्रवासियों ने हिंदी को एक वैश्विक मंच प्रदान किया है। संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) जैसे खाड़ी देशों में काम करने वाले लाखों भारतीय मजदूर और पेशेवर इस भाषा को वहां की सड़कों और बाजारों तक ले आए हैं। यूएई में हिंदी न केवल भारतीय प्रवासियों की संपर्क भाषा है, बल्कि स्थानीय समाज और यहां तक कि वहां के प्रशासनिक तंत्र द्वारा भी इसे विशेष पहचान दी गई है।

पश्चिमी देशों की बात करें तो संयुक्त राज्य अमेरिका और यूनाइटेड किंगडम (ब्रिटेन) में हिंदी का प्रभाव आधुनिक तकनीक, मीडिया और शैक्षणिक संस्थानों तक फैल चुका है। अमेरिका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय अपने त्योहारों, सामुदायिक केंद्रों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से हिंदी को जीवित रखे हुए हैं। वहीं, ब्रिटेन में कई स्कूलों और भाषा केंद्रों में हिंदी को पाठ्यक्रम के रूप में पढ़ाया जाता है, ताकि नई पीढ़ी अपनी भाषाई और सांस्कृतिक विरासत से कटी न रहे। दक्षिण अफ्रीका में भी महात्मा गांधी के ऐतिहासिक जुड़ाव और भारतीय प्रवासियों की मौजूदगी के चलते हिंदी धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का एक अनिवार्य हिस्सा बनी हुई है।

सांस्कृतिक कूटनीति और भविष्य की संभावनाएं
हिंदी की यह वैश्विक यात्रा यह साबित करती है कि भाषा केवल शब्दों का समूह नहीं होती, बल्कि यह संस्कृति, संवेदना और इतिहास की संवाहक होती है। जब कोई प्रवासी सात समंदर पार अपनी मातृभाषा में बात करता है, तो वह अनजाने ही भारत की सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका निभाता है। आज डिजिटल युग और सोशल मीडिया के दौर में हिंदी की पहुंच और अधिक सुगम हो गई है। वैश्विक स्तर पर हिंदी का यह विस्तार भारत की बढ़ती सांस्कृतिक शक्ति का परिचायक है, जो आने वाले समय में पूरी दुनिया को और अधिक करीब लाने का काम करेगा।
(लेखक: स्वतंत्र पत्रकार है)