दलित लेखिका डॉ कुसुम मेघवाल के साथ अभी भी जारी है धमकी और डर भरा माहौल
राजस्थान में सिमित होती लिखने की आज़ादी की निंदा
कुसुम मेघवाल को अपनी रचना मुक्त रूप से करने के हक़ को सुरिक्षत रखने की मांग करता PUCL
फ़िरोज़ खान ( Edited by आज़ाद नेब )
जयपुर ग्रामीण, 25 मई। उदयपुर की निवासी 70 वर्षीय दलित लेखिका डॉ कुसुम मेघवाल कोउनकी एक किताब को लेकर जान से मार डालने की धमकियां दिएजाने तथा प्रशासन द्वारा उन्हें कोई सुरक्षा मुहैया नहीं कराये जाने कोलेकर पीयूसीएल राजस्थान ने राजस्थान सरकार की कड़ी आलोचनाकी है ।
पीयूसीएल द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि यह अभिव्यक्तिके अधिकार पर हमला है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। गौरतलब है कि डॉ कुसुम मेघवाल दलित बहुजन समुदाय की जानीमानी लेखिका है ,उनकी अब तक 65 बुक्स प्रकाशित हो चुकी है और 5 किताबें प्रकाशनाधीन है।
डॉ मेघवाल ने सबाल्टर्न हिस्ट्री की कई शोधपूर्ण किताबे लिखी है ।इसमें एक पुस्तक महाराणा प्रताप के बारे में भी है जिसका नाम ‘ महाराणा प्रताप भील थे ,राजपुत्र नहीं ‘.यह पुस्तक 2 वर्ष पहलेप्रकाशित हुयी थी ,लेकिन हाल ही में करणी सेना नामक एक जातीयसंगठन ने इस किताब को लेकर लेखिका को धमकाना शुरू कर दियातथा जान लेने की खुलेआम धमकियां दी। देश भर से सैकड़ों लोगों नेफ़ोन पर दलित लेखिका डॉ कुसुम मेघवाल को गन्दी गलियां दी औरजान से खत्म करने की धमकी दी ।जिससे डॉ मेघवाल अपने ही घरमें कैद हो कर रह गई है।
करणी सेना से जुड़े लोगों ने उन्हें हर हाल में सबक सिखाने की धमकी दी है। दलित लेखिका ने पुलिस को फोन नम्बर सहित धमकाने वालों कीपूरी डिटेल्स नामजद दी है ,लेकिन आज तक कोई मुकदमा दर्ज नहीकिया गया है और ना ही कोई सुरक्षा दी गई है।
पीयूसीएल का मानना है कि अगर किसी को डॉ मेघवाल के लेखन सेअसहमति है या उनकी भावनाये आहत है तो वे अदालत में जा सकतेहै ,क़ानूनी कार्यवाही करवा सकते है ,जो कि लोकतान्त्रिक रास्ताहोगा,मगर करणी सेना सीधे धमकी दे कर भय तथा हिंसा का माहौलबना रही है ,जिसे सहन नही किया जा सकता है । पीयूसीएल ने दलित लेखिका की सुरक्षा सुनिश्चित की जाने की मांगकरते हुए धमकी देने वाले तत्वों के खिलाफ कार्यवाही की मांग की है।
पीयूसीएल का मानना है कि राजस्थान में विगत लंबे समय से दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समुदाय से ताल्लुक रखने वाले लेखकों , पत्रकारों तथा कलाकारों की कृतियों पर हमले बोले जा रहे है ,उनपर प्रतिबन्ध लगाये जा रहे है ,जो कि अनुचित है तथा पीयूसीएलइसकी कड़ी निंदा करती है ।
राजस्थान में अभिव्यक्ति की आज़ादी नही है ,एक अघोषित प्रतिबन्धलगा हुआ है। पहले भी सोहनलाल सिंगारिया की किताब “शर्म से कहो हम हिन्दूहैं’,आर के आकोदिया की किताब ‘हिन्दू धर्म की विडंबनाएं’ व भंवरमेघवंशी की “फासीवाद की आहटें” के लिए इसी तरह की धमकियांलेखकों को दी गयी हैं।जमालुद्दीन जोहर को उनकी राजस्थानी भाषाकी पुस्तक “सपूतां सुणो” के लिए विश्व हिन्दू परिषद् व बजरंग दल केविरोध के चलते अपनी किताब वापिस लेनी पड़ी।
ब्राह्मणवादी हिंदुत्व के पाखण्डी स्वरुप पर कोई तर्क ,बहस या चर्चासंभव नहीं रह गयी है ,ऐसे में पीयूसीएल का मानना है कि राजस्थानका माहौल बदलना चाहिए।




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