
श्रीरामकथा के श्रवण से मिलती है पाप की प्रवृति से मुक्ति : योगेंद्र बालकृष्ण शास्त्री
सीवान के हसनपुरा प्रखंड स्थित उसरी शिवमंदिर परिसर में हिन्दू युवा वाहिनी, बजरंग दल व श्री रामनवमी सेवा समिति द्वारा आयोजित 9 दिवसीय श्रीराम जन्मोत्सव समारोह के पावन अवसर पर आयोजित प्रवचन कार्यक्रम में व्यास-गद्दी पर विराजमान धर्मनगरी श्रीधाम वृंदावन से पधारे पूज्यपाद श्री योगेंद्र बालकृष्ण शास्त्री द्वारा अपने मुखारवृन्द से भक्तो को संगीतमय श्रीराम कथा का रसपान कराया गया। इस दौरान स्वामी जी ने श्रीराम कथा की तुलना पतित-पावनी गंगा से करते हुये भक्तो को बताया कि एक गंगा अविनाशी भोलेशंकर के जटा से निकलती है और हरिद्वार में बहती है। वही श्रीरामकथा रूपी गंगा स्वयं भगवान भोलेनाथ के श्रीमुख से निकली है। गंगा में डुबकी लगाने से पाप धुलते है। परंतु गंगा में डुबकी लगाने और पाप से मुक्ति के लिये हरिद्वार जाना होगा। परंतु श्रीरामकथा के श्रवण और पाप की प्रवृति से मुक्ति के लिये कही जाने की आवश्यकता नही। संतो का संगत कीजिये। श्रीरामकथा का श्रवण कीजिये और पाप से मुक्ति पाइये। सत्संग से संशय मिटता है।

त्रेतायुग में मर्यादापुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम पर दक्षपुत्री उमा ने भगवान भोलेनाथ से संशय किया था। तब भोलेनाथ माता गौरी के संशय की समाप्ति के लिये महामुनि के पास पहुच श्रीराम कथा का श्रवण किया था। ऋषि अगस्त ने तो यहाँ तक कह दिया कि राम एक नही दो है। “एक राम दशरथ को प्यारे, एक राम जगत से न्यारे”। उनके संशय का निवारण महर्षि याज्ञवलक्य ने करते हुये कहा कि “राम एक नर भूपाला, भुनेश्वर कालहु कर काला”। सत्संग की व्याख्या करते हुये महाराज श्री ने कहा कि तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और सरस्वती जैसी पवित्र नदियों का संगम होता है और सत्संग में कर्म, भक्ति और अनुराग का संगम होता है। योग, साधना, आराधना, आरती, हवन व पूजन एक व्यक्ति द्वारा संभव है। परंतु सत्संग एकाकी में संभव नही है। सत्संग दो या दो से अधिक के बीच ही संभव है। प्रथम वक्ता और द्वितीय श्रोता। वक्ता चौकीदार होता है। जो धर्म, वेद, ग्रंथ, समाज, संस्कृति और राष्ट्र की चौकीदारी करता है। वही श्रोता जमीदार होता है। त्रेतायुग में महामुनि और महागौरी व उमापति के बीच हुआ सत्संग, कलयुग के प्रारम्भ में सुखदेव जी महाराज और राजा परीक्षित के बीच नैमिषारण्य में हुआ सत्संग इसका प्रमाण है। कलयुग में जीवो के अंतःकरण के कलुष भंजन के लिये गौस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचरितमानस का लोकभाषा अवधि में गायन किया है। मौके पर आयोजन समिति के संरक्षक श्री श्री 108 श्री पुरुषोत्तम दास जी महाराज, यज्ञाचार्य राजू मिश्र, हरि जी मिश्र, हलचल दास जी महाराज, लक्ष्मीकांत पाठक, पूर्व मुखिया श्रीकृष्ण प्रसाद, शंकर शर्मा, कृष्णा शेखर जयसवाल, बलराम महतो, रविन्द्र कुशवाहा, जगदीश भगत, छठ्ठू लाल गुप्ता, प्रदीप राम, शत्रुध्न प्रसाद, हरेराम प्रसाद, प्रकाश गुप्ता, संजय मोदनवाल, गुड्डू जी, परमानंद भगत, परमात्मा प्रसाद सहित सैकड़ो रामभक्त मौजूद थे।
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✍परमार मीडिया सीवान




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