
छपरा. हिन्दू हों या मुसलमान, एक ही कश्ती के मुसाफिर हैं, डूबेंगे तो साथ, पार उतरेंगे तो साथ. मौलाना मजहरूल हक का यह कथन आज देश के लिए बहुत ही प्रासंगिक है. उक्त बातें विधान पार्षद डॉ वीरेंद्र नारायण यादव ने कहीं. जिला प्रशासन के तत्वावधान में रविवार को 153वीं हक जयंती राजकीय समारोह के रूप में आयोजित की गयी. मजहरुल हक चौक और एकता भवन में अवस्थित हक साहब की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उनके प्रति श्रद्धा सुमन अर्पित किया गया. माल्यार्पण के बाद डॉ यादव ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मजहरुल हक साहब ने देश की आजादी और स्वतंत्रता सेनानियों की मदद के लिए अपना पद, घर-बार, धन संपत्ति सबकुछ दान कर दिया. ऐसा त्याग कम देखने को मिलता है. मौके पर मौजूद मजहरुल हक स्मारक ट्रस्ट के अध्यक्ष सह बिहार विधान परिषद के पूर्व उपसभापति सलीम परवेज ने कहा कि हक साहब देश के अग्रणी स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल थे. महात्मा गांधी उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे. छपरा उनकी कर्मभूमि थी. इस्लाम के सदाकत (सत्य) और सनातन के आश्रम को उन्होंने प्रायोगिक तौर पर एक करते हुए अपने घर व 16 बीघा जमीन को सेनानियों के लिए सदाकत आश्रम के रूप में दान दे दिया. यह उनके त्याग, बलिदान और हिंदू मुस्लिम एकता की मिसाल है. उन्होंने जिला प्रशासन द्वारा प्रतिमा स्थल पर कुर्सी और एकता भवन में सभा की व्यवस्था नहीं किए जाने पर नाराजगी जाहिर की. माल्यार्पण करने वालों में जिला परिषद अध्यक्ष सुनील राय, कमिश्नर राबर्ट एल चुंगथू, एडीएम अरुण कुमार, एडीएम विभागीय जांच भरत भूषण, ओएसडी सह डीसीएलआर संजय कुमार, राजद जिलाध्यक्ष जिलानी मोबीन, कांग्रेस नेता नदीम अख्तर अंसारी, न्याय के महासचिव सुल्तान हुसैन इद्रीसी, ट्रस्टी मंजूर अहमद, हरि प्रकाश गोकुल, यूसुफ महमूद बबलू आदि उपस्थित थे.




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