मृत्युंजय त्रिपाठी की कलम से : जानिए…लोक आस्था के छठ महापर्व में महिलाएं माथे से नाक तक क्यों लगाती हैं सिंदूर… !

पिछले वर्ष छठ पर लेखिका मैत्रेयी पुष्पा ने टिप्पणी की थी कि न जानें क्यों “महिलाएं माथे से नाक तक सिंदूर पोत लेती हैं”। उन्हें कई ने बड़े सधे जवाब दिए जिससे उनकी विद्वता को ठेस पहुंची और उन्होंने सबको फेसबुक पर अनफ्रेंड या ब्लॉक कर बताया कि जैसे उनके माथे पर सिंदूर नहीं है, वैसे ही सिंदूर क्यों न लगाएं, इसका उनके पास कोई तर्क भी नहीं है। हां, चूंकि वह सिंदूर नहीं लगातीं और तब भी विद्वान हैं इसलिए वे सारी महिलाएं मूर्ख समझ ली जानी चाहिए जो सिंदूर लगाती हैं…। खैर…।


आज फिर छठ है। आज फिर सिंदूर का जगमग संसार दिखेगा जिसकी रोशनी में न जाने कितनों की विद्वता वाली आंखें चौधिया जाएंगी और उन्हें विरोध के सिवा कुछ और नजर नहीं आएगा…। हम कहना चाहते हैं कि माथे से नाक तक आस्था, विश्वास, परंपरा, संस्कृति का सिंदूर लगाने वाली महिलाओं को देख यदि मैत्रेयी पुष्पा जैसी बिना सिंदूर वाली महिलाएं जलती हैं, कुढ़ती हैं तो दोष न तो सिंदूर का है, न ही उन महिलाओं का; दोष तो है उस कथित विद्वता, उससे उपजे घमण्ड का और स्वयं के प्रकृति से विमुख होकर भी पूर्ण समझ लेने के पाखण्ड का…। सारा दोष उस विद्वता का है जिसका आवरण पाते ही कुछ महिलाएं संस्कृति से विमुख होकर भी स्वयं को पूर्ण समझने लगती हैं, और प्रकृति पूजक महिलाओं की पूर्णता को अपूर्णता समझने की मूर्खता करने लगती हैं…।

सच जानिए, सारा दोष इस कथित विद्वता का ही है…। छठ मैया उन सभी कथित विद्वान महिलाओं-पुरुषों को सद्बुद्धि दें जो स्वयं जिन चीजों को सहेज नहीं पाते, उन्हें अन्य के लिए भी छिन्न-भिन्न कर देना चाहते हैं, तबाह कर देना चाहते हैं और इनका पहला शिकार है- सनातन धर्म- भारतीय सभ्यता-संस्कृति, शादी-विवाह-परिवार, सात जन्मों का बंधन, पितरों को तर्पण, उगते के साथ डूबते सूरज की पूजा, धोती-साड़ी, तिलक और सिंदूर! संस्कृति से कंगाल इन नर कंकालों से बचने की जरूरत है ताकि देह के पार जीवन शेष रहे, ताकि देह मरे तो भी आत्मा बची रहे, ताकि भौतिकता से पार हमारी आध्यात्मिकता अक्षुण्ण रहे।
हम गंवारों के तरफ से सभी कथित विद्वानों को महापर्व छठ की शुभकामनाएं
कॉपी #Mrityunjay Tripathi के फेसबुक वाल से