नीरज कुमार/मढ़ौरा (सारण)।

बिहार में पंचायत चुनाव को लेकर परिसीमन के नाम पर हो रही देरी ने एक गंभीर संवैधानिक और लोकतांत्रिक सवाल खड़ा कर दिया है। मुख्य सवाल केवल चुनाव की तारीख का नहीं है, बल्कि यह है कि क्या किसी प्रशासनिक प्रक्रिया को आधार बनाकर स्थानीय लोकतंत्र को निर्धारित समय से आगे टाला जा सकता है?

भारतीय संविधान ने पंचायतों को केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं माना है, बल्कि उन्हें स्थानीय स्वशासन और लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था का मुख्य हिस्सा बनाया है। 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायतों को संवैधानिक दर्जा मिला और संविधान के अनुच्छेद 243E में पंचायत का कार्यकाल अधिकतम पाँच वर्ष निर्धारित किया गया। इस अनुच्छेद की भावना बिल्कुल स्पष्ट है कि पंचायत का कार्यकाल समाप्त होने से पहले उसके अगले चुनाव की प्रक्रिया पूरी हो जानी चाहिए। वहीं, अनुच्छेद 243K पंचायत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपता है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि पंचायत का निर्धारित कार्यकाल समाप्त होने वाला है, तो परिसीमन की प्रक्रिया को चुनाव कराने में बाधा क्यों बनने दिया जाए?

2011 की जनगणना और आज की वास्तविकता

बिहार में पंचायत चुनाव के लिए 2011 की जनगणना को आधार बनाकर नए परिसीमन की तैयारी की जा रही है। लेकिन आज 2026 चल रहा है। 2011 के बाद लगभग 15 वर्ष बीत चुके हैं। इन डेढ़ दशकों में बिहार के गांवों का सामाजिक और भौगोलिक स्वरूप बहुत बदल चुका है।

  • कई नई बस्तियां विकसित हुई हैं और गांवों का दायरा बढ़ा है।
  • शहरों और कस्बों के आसपास ग्रामीण आबादी तेजी से बढ़ी है।
  • अनेक क्षेत्रों में जनसंख्या का जनसांख्यिकीय स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है।

ऐसे समय में 15 साल पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन करना अपने आप में एक बड़ा प्रश्न है। यदि उद्देश्य वास्तविक जनसंख्या के आधार पर न्यायपूर्ण प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, तो नए और अद्यतन आंकड़ों की आवश्यकता है।

लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और जनता का अधिकार

परिसीमन यदि आवश्यक है, तो सरकार और संबंधित संस्थाओं को इसे तेजी से पूरा करना चाहिए। लेकिन परिसीमन की प्रक्रिया को पंचायत चुनाव टालने का कारण बनाना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। परिसीमन और चुनाव—दोनों प्रक्रियाओं को समानांतर रूप से आगे बढ़ाने का मार्ग क्यों नहीं खोजा जा सकता?

लोकतंत्र में निर्वाचित संस्थाओं का समय पर गठन केवल एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर जनता के अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है। पंचायतें गांव के स्तर पर लोकतंत्र की सबसे पहली और महत्वपूर्ण सीढ़ी हैं। यहीं से आम नागरिक सीधे तौर पर शासन और विकास की प्रक्रिया से जुड़ता है। इसलिए पंचायत चुनाव में अनावश्यक देरी का अर्थ केवल एक चुनाव को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि स्थानीय लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को लंबित करना है।

निष्कर्ष

संविधान का अनुच्छेद 243E पंचायत के कार्यकाल और चुनाव की समयबद्धता के संबंध में एक स्पष्ट ढांचा प्रदान करता है। किसी भी प्रशासनिक प्रक्रिया को इस तरह से संचालित नहीं किया जाना चाहिए जिसका परिणाम पंचायत चुनाव का स्थगन बन जाए। यदि परिसीमन जरूरी है, तो उसकी प्रक्रिया पारदर्शी और वैज्ञानिक होनी चाहिए, साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया बाधित न हो।

लोकतंत्र में चुनाव सरकार की सुविधा का विषय नहीं, बल्कि जनता का संवैधानिक अधिकार है। बिहार में पंचायत चुनाव समय पर होने चाहिए और परिसीमन को चुनाव प्रक्रिया के साथ समन्वय करके पूरा किया जाना चाहिए। किसी भी परिस्थिति में ऐसी स्थिति नहीं आनी चाहिए कि गांव की सरकार का कार्यकाल समाप्त हो जाए और नई सरकार चुनने के लिए जनता को अनिश्चितकाल तक इंतजार करना पड़े।

नीरज कुमार