राजनीतिक धर्म और धर्म की राजनीति के बीच बड़ा फासला

©मनोज कुमार सिंह/मांझी(सारण) : द्वारिका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा है कि भाजपा और आरएसएस ने हिंदुत्व को सर्वाधिक आघात पहुंचाया है। उन्होंने दावा किया है कि बीफ के ब्यवसाय में निर्यातक के रूप में इनके नेताओं की अग्रणी भूमिका है। उन्होंने चुनौती भरे लहजे में कहा कि पीएम मोदी और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को हिंदुत्व के इतिहास उसके मूल स्वरूप तथा सनातन संस्कृति के गुढ़ रहस्यों का ज्ञान नही है। उनका यह बयान ऐसे मौके पर आया है जब पिछले एक वर्ष में भाजपा एक एक कर पांच राज्यों में चित हो चुकी हैं।विचारणीय विंदु यह है की वेद शास्त्र के महान ज्ञाता उदभट विद्वान शंकराचार्य जो कि वर्षों से भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की पुरजोर वकालत करते रहे हैं। सरकार से कहाँ चूक हुई। कई जानकारों का मानना है कि जगद्गुरु देश के पांच सन्तों को मोदी सरकार द्वारा सम्मान जनक पदों पर आरूढ़ किये जाने से खफा हैं। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या सरकार धर्म विमुख राजनीति की ओर अग्रसर हो चली है अथवा धर्म के संचालन की बागडोर राजनीतिज्ञों ने अपने पाले में कर ली है।राम जन्म भूमि के लिए चलाया गया आंदोलन राजनीति है। जबकि भगवान श्री राम के आदर्शों को आत्मसात करना धर्म है। हिन्दू रीति रिवाजों धार्मिक कथानकों प्रचलित मान्यताओं के अनुसार सपत्नीक ही कोई शुभ कार्य सम्पन्न कराया जाना पूर्व परिभाषित धर्म का आधार है। डंका हृदय की सुसुप्त धमनियों में रक्त संचालित करने में कारक होता है जबकि डीजे हार्ट अटैक का कारण बन रहा है। एकाग्रता साधना की आवश्यक शर्त होती है शोर में चितचोर की खोज समाज का वीभत्स स्वरूप है।राजनीति का एक अपना धर्म हुआ करता है। वह धार्मिक रीति रिवाजों व आख्यानों पर आरूढ़ न होकर उन परम्पराओं का सन्तुलित निर्वहन करता है जो उस काल के समाज में प्रचलित हैं। मानवीय मूल्यों पर आधारित साम दाम तथा दण्ड व विभेद उसके मजबूत स्तम्भ होते हैं।इसके विपरीत धर्म सूर्य के प्रकाश तथा बारिस की बूंदों की भांति सबको ऊर्जा तथा सरसता प्रदान करता है। धर्म पर राजनीति का आच्छादित होना विनाश का कारक बनता है जबकि धर्म युक्त राजनीति राम राज्य का मार्ग प्रशस्त करती है। इतिहास के आईने में नजर घुमाएं तो पता चलता है कि धर्म को सम्प्रदाय के दायरे में आंकने की भूल करने वाला समाज व देश वर्तमान इतिहास को धूल धूसरित कर डालता है। धर्म सर्व श्रेयस्कर व सर्वमान्य हुआ करता है जबकि राजनीति सर्व ग्राह्य होना चाहिए।