*मधेपुरा:समाज के दर्पण हैं पत्रकार,भूलें नहीं लोग:-मधेपुरा पुलिस अधीक्षक विकास कुमार*
संजय कुमार सुमन
सम्पादक@दैनिक खोज खबर
डॉ. अकबाल ने कहा था –
“हैं लोग वही जहाँ में अच्छे ,
आते हैं जो काम दूसरों के ।”
उपरोक्त पंक्ति मधेपुरा जिलान्तर्गत चौसा थानाध्यक्ष सुमन कुमार सिंह के संदर्भ में सर्वथा प्रासंगिक है । कलियुग के चरम पराकाष्ठा के दौर में जब प्रत्येक प्राणी स्वार्थ के वशीभूत हो चुका हो , ऐसे समय जब कोई किसी की मदद के लिए सामने खड़ा हो जाए तो निःसंदेह वह अच्छा ही कहा जाएगा।
ज्ञातव्य है कि गत दिनों मधेपुरा जिलान्तर्गत फुलौत ओपी पर बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने हमला कर दिया था । उस घटना में पुलिसकर्मी सहित मीडियाकर्मी भी घायल हुए थे । दुर्भाग्य सेस्थानीय पत्रकार बिपिन बिहारी भीड़ के हत्थे चढ़ गए थे जिसमें उनका मोबाइल फोन क्षतिग्रस्त हो गया था । वह घटना इतनी संवेदनशील थी कि जिला प्रशासन हिल गया था । चूँकि फुलौत ओपी चौसा थाना के अधीन है ।

लिहाजा थानाध्यक्ष श्री सुमन को अपनी पत्नी को अस्पताल के मृत्युशय्या पर छोड़ कर दियारा में पसीना बहाना पड़ा था ।
आज जब वे थाना में कुछ सकून की सांसे ले रहे थे तभी उन्हें पत्रकार श्री बिहारी का ख्याल आया । वे चल पड़े उनसे मिलने । रास्ते पूर्व बीस सूत्री अध्यक्ष अंबिका गुप्ता, जदयू नेता नरेश ठाकुर निराला ,अबुसालेह सिद्दीकी, पंचायत समिति सदस्य मुकेश कुमार, समाजसेवी संतोष पासवान, वीरेंद्र कुमार, चमकलाल मेहता, झावर मेहता, पत्रकार आरिफ आलम, मनीष अकेला आदि मिलते गए और साथ होते गए । सभी थानाध्यक्ष के नेतृत्व में पीड़ित पत्रकार के घर पहुंच कर उन्हें सांत्वना दी और घटना की तीखी आलोचना किया । इसी दौरान थानाध्यक्ष श्री सुमन को पीडि़त पत्रकार के मोबाइल फोन क्षतिग्रस्त हो जाने की जानकारी हुई । उन्होंने फौरनअपने खर्च से एक नया सेलफोन मंगाया और पत्रकार श्री बिहारी को भेंट करते हुए सिर्फ इतना कहा –
“तुम्हारी एक हँसी मेरे दिल की धड़कन है ,
उन्हें यूँ न आंसूओं में बहाया करो ।”
आज थानाध्यक्ष श्री सुमन की इस दरियादिली और इंसानियत की चर्चा लोगों की जुबान पर है । जो उन्हें करीब से जानते हैं वो कहते नहीं अघाते –
“दिल की खामोशी से सांसों के ठहर जाने तक ,
याद आएँगे मुझे वो मर जाने तक ।”

उधर,मधेपुरा पुलिस अधीक्षक विकास कुमार ने इस घटना की तीखी निंदा करते हुए कहा कि पत्रकार समाज का आईना होता है । वह समाज के लिए काम करते हैं और लोग इस चीज को भूल जाते हैं।सामाजिक सरोकारों तथा सार्वजनिक हित से जुड़कर ही पत्रकारिता सार्थक बनती है। सामाजिक सरोकारों को व्यवस्था की दहलीज तक पहुँचाने और प्रशासन की जनहितकारी नीतियों तथा योजनाआें को समाज के सबसे निचले तबके तक ले जाने के दायित्व का निर्वाह ही सार्थक पत्रकारिता है। फुलौत की घटना निंदनीय है ।

साहित्यकार याहिया सिद्दीकी ने कहा कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा पाया (स्तम्भ) भी कहा जाता है। पत्रकारिता ने लोकतंत्र में यह महत्त्वपूर्ण स्थान अपने आप नहीं हासिल किया है बल्कि सामाजिक सरोकारों के प्रति पत्रकारिता के दायित्वों के महत्त्व को देखते हुए समाज ने ही दर्जा दिया है। कोई भी लोकतंत्र तभी सशक्त है जब पत्रकारिता सामाजिक सरोकारों के प्रति अपनी सार्थक भूमिका निभाती रहे। सार्थक पत्रकारिता का उद्देश्य ही यह होना चाहिए कि वह प्रशासन और समाज के बीच एक महत्त्वपूर्ण कड़ी की भूमिका अपनाये।लेकिन समाज अपने निजी स्वार्थ के लिए पत्रकार पर बराबर हमला करते हैं। जो निंदनीय और बर्दाश्त योग्य नहीं है। पर आज ऐसा क्यों करते समझ में नहीं आता है।

इंडियन जर्नलिस्ट एसोसियन के निवर्तमान प्रदेश महासचिव दयानंद भारती ने कहा कि पत्रकारिता की पहुँच और आभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का व्यापक इस्तेमाल आमतौर पर सामाजिक सरोकारों और भलाई से ही जुड़ा है, किंतु समाज के कुछ लोग इसका दुरपयोग भी करने लगे हैं। पत्रकार से काम निकल पाया तो ठीक नहीं तो पत्रकार खराब। पत्रकार समाज और प्रशासन के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी होती है । ये सब जानते हैं लेकिन पत्रकार पर समाज के लोगों का प्रहार दुखदायी हैं । समाज को इससे बचना चाहिए।





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