*भोजपुरिया लाल – मो. खलील*

*✍ धनंजय सिंह*
दैनिक खोज खबर ब्यूरो ,सीवान
♨का जमाना आय गयल की फूहर पातर लिखला के आरोप में पुलिस रिकार्ड में जे फरार रहल होखे ओही के कला अउर संस्कृति के बढ़ावे क जिम्मा बिहार में दे देहल गयल बा,अब मंत्री हो गइलें अउर मंत्री बनते पहिला काम ई कइलें की अदालत जा के आपन जमानत लेहलें. अइसन कलाकार लोग कहेला की जनता के मांग पर जवन समाज सुने चाहेला उहे लिखे अउर गावे के पड़ेला. अइसन लोगन के बलिया के माटी से निकलल मोहम्मद खलील क जीवनी पढ़ावे के चाही. बलिया में रेलवे में चउथी दर्ज़ा क कर्मचारी रहें खलील जी, गावे -बजावे क हुनर रहे लेकिन साथे इहो लगन रहे की चाहे जवन हो जाए फूहर -पातर कबहूँ न जबान से निकली. झंकार नांव से आपन पार्टी बनवले रहन,गला क मिठास अउर उतार चढ़ाव त अइसन की कवनो कोना से केहू गवइया से कमजोर न रहें. बलिये क सीताराम चतुर्वेदी जी के गीत ‘छलकल गगरिया मोर निरमोहिया’ के जब खलील क गला मिलल त सगरे जवार में ओनकर डंका बजे लागल . नौकरी में बदली होके इलाहाबाद आ गइलें त भोजपुरी क माहौल त कम रहे लेकिन गीतकार लोग ढेर भेंटा गइल लोग. भोलानाथ गहमरी जी आपन ‘कौने खोंतवा में लुकइलू आहि रे बालम चिरई’ खलील जी के देहलें त झंकार पार्टी फिरो तन गइल अउर चारो ओर भोजपुरी के नांव पर बस खलील -खलील होए लगल.एह गीत के बाद में न जाने केतने लोग गवलन लेकिन पैमाना मोहम्मद खलील क गायकी ही रहल.
बेकल उत्साही क लिखल ‘गंवई में लागल बा अगहन क मेला/ गोरी झुकि-झुकि काटेलीं धान’ हो भा महेन्दर मिसिर क ‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हो’ खलील क आवाज बेजोड़ रहे.लिखवइया लोग ,भोजपुरिया गीतकार लोग क सपना हो गयल की उनकर लिखल खलील के गला से सबके सुने के मिलो. भोजपुरिया के साथे हिंदी गीतकार लोग भी मोहम्मद खलील के अपने बइठकी में शामिल करे लगलन. मान बढ़त गईल लेकिन मोहम्मद खलील कबहूँ भोजपुरी अउर ओकरे मान मर्यादा से कवनो समझौता न कइलें, कबहूँ बजार के फेरा में न पड़लन. नौकरियो साथे चलते रहल,कैसेट -सीडी निकाले क भी खियाल ना रहे.कहल जाला की एक बेर नौशाद उनके बम्बई ले गइलें,कवनो गीत में नौशाद साहब बम्बई के हिसाब से फेर बदल करे के कहलन त भोजपुरिया माटी क लाल मोहम्मद खलील नराज़ हो गइलें अउर कहलें की ‘भोजपुरी खातिर हम अपना के बेच देब लेकिन अपना के खातिर भोजपुरी क सउदा ना करब.’ जहाँ लोग तरसे लें की बम्बई जाए क मौका मिलो, कवनो नामी आदमी से जुगाड़ लग जावो उहें खलील नौशाद जइसन हस्ती के ना कहके अउर मायानगरी के लात मार के इलाहाबाद आ गइलें.
पचपन साल के उमिर में 1991 में संगम के माटी पर मोहम्मद खलील दुनिया छोड़ गइलें, जनाजा में जवन भीड़ निकलल ऊ भोजपुरिया क सम्मान रहे.आज जब भोजपुरिया गीतन के नांव पर अइसन कुल सुने के मिलेला जवन गावे वाला भी अपने घरे में न गा सके,मन करेला की बाजा कूंच देवल जाय भा गावे वाला मिले त ओकरे के समझावल जाय की भइया अब रहम कर हमरे बोली पर,एके तोहरे जइसन गवइयन से मुक्ति चाही,तब मोहम्मद खलील जइसन लोगन क धियान पड़े ला की ‘अपने खातिर भोजपुरी क सउदा ना करब’.अब आशा केसे कइल जावो जब ‘दीयवा बुता के लूटब, मस्ती अन्हार में’ क संदेसा देवे वालन के ही जिम्मेवारी मिल गइल बा सुधार क?
*👉साभार: ” आखर “*
{भोजपुरी ई-पत्रिका }




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