बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री जगरनाथ मिश्रा द्वारा प्रदेश में उच्च शिक्षा क्रांति का लक्ष्य बनाकर प्रदेश में सरकारी विद्यालयों व महाविद्यालयों का संख्या अल्प होने के कारण प्रदेश के शिक्षाविद्दो से अनुदानित संस्थान खोलने का अपील किया गया और प्रदेश में उच्च शिक्षा के लिए प्राइवेट संस्थान काफी तेजी से खुले। प्रदेश में डिग्रीधारियों का संख्या बढ़ने लगा। शिक्षा को बढ़ावा देने में प्राइवेट संस्थानो का सहयोग काफी सराहनीय रहा है। उक्त बातें राष्ट्रीय युवा विकास मोर्चा के प्रवक्ता राजन कुमार ने कहा। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पहली बार इन सभी अनुदानित संस्थाओं को 2008 में अनुदान दिया और बीएसईबी व विश्विद्यालय से सम्बद्धता मान्यता लेने का निर्देश दिए। जिससे प्रदेश में संस्थाओं को मान्यता लेने का दौड़ शुरू हो गया। इसी काल मे कुछ लोग मान्यता प्राप्त कर कागत पर ही संस्थान चलाने लगे। यह शिलशिला चल ही रहा था कि प्रदेश में टॉपर घोटाला हुआ और सभी संस्थानों का जांच होने लगा। इस जांच राजनीतिक पहुँच रखने वाले संस्थानों को छोड़कर बड़ी संख्या में सम्बद्धता रदद् किया जाने लगा। उसमे वैसे भी संस्थानों का मान्यता रदद् किया गया , जो 1980-90 के दशक से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदेश के विद्यार्थियों को देते रहे है।
वैश्विक महामारी कोरोना काल में प्रदेश के श्रमिकों का विश्व स्तर पर मजाक बनने के बाद प्रदेश में रोजगार का बात किया जा रहा है। किंतु यह कौन सी न्यायचक्र है कि प्रदेश के कई हजार वित्तरहित संस्थाओं के शिक्षक व शिक्षकेत्तर कर्मचारियों का अनुदान 2008 के बाद नहीं दिया गया है ? जिससे प्रदेश के कई हजार परिवार का भोजन चलता है। आप प्रदेश में रोजगार की बात कर रहे है और दूसरे तरफ शिक्षा हितैषियों का भूख से हत्या करना चाह रहे है। यह प्रदेश के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रदेश में वित्तरहित संस्थाओं में कार्यरत कर्मचारियों को ससमय अनुदान नहीं देना, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के विनाश का षडयंत्र है।