प्रो. भूपेश प्रसाद।
दैनिक खोज खबर/मढ़ौरा (सारण)। आज कल मध्यकालीन इतिहास को लेकर राजनीति के खिलाड़ियों द्वारा खेल खेला जा रहा है वह भी कब जब मध्यकालीन इतिहास को पाठ्य पुस्तकों से हटाने की कवायद जारी है । ऐसे समय में कभी औरंगजेब अपनी कब्र से जिंदा हो जा रहा है तो दूसरी तरफ शिवा जी भी जीवित हो उठते हैं । कभी बाबर कब्र से बाहर आता है तो उसी के साथ राणा सांगा भी अपनी चिता की राख से जी उठते हैं। हो सकता है अकबर को भी कब्र से बाहर निकलना पड़े  बस महाराणा प्रताप के राष्ट्रप्रेम को जगने की देरी है ।
इन एतिहासिक पात्रों और उनके साथ घटी घटनाओं को समझने के लिए ईमानदारी के साथ इतिहास की पड़ताल आवश्यक है । इसके लिए सब से पहले मानव मनोविज्ञान को समझना होगा । मानव मनोविज्ञान कहता है कि मानव जिन परंपराओं , विश्वासों और मूल्यों के जितना करीब होता है वह सर्वाधिक सत्य उन्ही को मानता है ।ऐसे में जब इतिहास की घटनाएं उसके सामने आती है तो वह अपने विश्वासों के करीब की घटनाओं पर ज्यादा विश्वास करता है विपरीत घटनाओं को बेमन से स्वीकार करता है या इतिहासकार अथवा लेखक पर दोषारोपण करता है कि फलां ने गलत लिखा है। यह सभी जानते हैं कि इतिहास के निर्माण के कारकों में जनश्रुतियां और कहानियां भी कम या ज्यादा उपस्थित रहती हैं। इतिहास पर इतिहासकार के विचार भी प्रभाव डालते हैं ।इतिहास में मूलतः दो विरोधी विचारधाराएं हर हाल में मौजूद रहती है । इसलिए कुछ भी कहने के पूर्व गहन अध्ययन की जरूरत होनी चाहिए ।
           अभी तरोताजा मामला राणा संग्राम सिंह उर्फ राणा सांगा को रामजी सुमन द्वारा गद्दार कहने को लेकर उभरा है। दूसरी तरफ से इसका विरोध जारी है । इस क्रम में सांसद सुमन के घर पर भी बवाल मचा है जो किसी भी तरह जायज नहीं है । इतिहास का जवाब इतिहास से देना चाहिए था लट्ठ से नहीं वहीं सांसद को भी संयमित भाषा और ठोस सबूतो के आधार पर संसद में बयान देना चाहिए था । इस तरह दोनो ही तरफ़ से गलतियां हुई हैं ।
       अब रही बात राणा सांगा की कि उन्होंने बाबर को बुलाया था या नहीं । इस प्रश्न पर सांसद को सीधे आरोप से बचना चाहिए था । राणा सांगा मेवाड़ के प्रतापी और वीर राजा थे जिनके बारे में मशहूर है कि उन्होंने एक सौ युद्ध लड़े और केवल एक युद्ध हारे।दूसरी तरफ बाबर एक महत्वाकांक्षी योद्धा था जिसे अपना एक राज्य स्थापित करना था । वह तथाकथित प्राचीन भारत के गंधार अर्थात अफगानिस्तान तक आ गया था ।सच्चाई यह है कि उसकी पहले से ही तथाकथित सोने की चिड़िया पर नजर थी । वह 1526 से पहले भी यहां के कुछ हिस्सों पर आक्रमण कर चुका था परिस्थितिवश उसे लौटना पड़ा था । दूसरी तरफ यहां राणा सांगा भी अपने राज्य अथवा रियासत का विस्तार चाहते थे । इस अभियान में तत्कालीन दिल्ली सल्तनत के  सुलतान इब्राहिम लोदी सब से बड़ी बाधा था ।
      बाबर की आत्मकथा से राणा सांगा और बाबर पूर्व परिचित थे । बाबर के बढ़ते अभियानों से इब्राहिम लोदी और राणा सांगा दोनो परिचित थे । ऐसे में एक अनुमान लगाया जा सकता है कि लोदी की चाह रही होगी कि बाबर नाम की बला दूर ही रहे और राणा सांगा की चाह रही होगी कि बाबर इब्राहिम लोदी को पराजित कर लूट पाट कर महमूद गजनवी की तरह वापस हो जायेगा तब उसके लिए दिल्ली फतह आसान हो जायेगा।
बाबर द्वारा आक्रमण का तात्कालिक कारण इब्राहिम लोदी द्वारा अपने मातहत गवर्नरों पर लगाम कसना था । खुद उसके चाचा दौलत खान लोदी जो पंजाब का गवर्नर था लोदी से खासा नाराज था और बाबर को यह पता था । इसी गवर्नर के इशारे पर बाबर ने योजना बनाई । बाबर की आत्मकथा इतना अवश्य कहती है कि राणा सांगा ने शुभकामना में कहा था कि आप जब दिल्ली पहुंचोगे तो मैं आगरा पहुंच जाऊंगा । किंतु इस कथन का दूसरा कोई साहित्यिक या एतिहासिक साक्ष्य नहीं मिलता ।
       अब जरा दूसरे पक्ष राष्ट्रीयता और हिंदुत्व की भी बातें कर ले ।अगर राष्ट्र की बात करें तो राष्ट्र की कल्पना मात्र ही बेमानी है । यहां एक नही कई  छोटे छोटे रियासत थे । उन्ही में से एक रियासत या छोटे राज्य के   राजा थे राणा सांगा । इन्हे भी  अपनी रियासत की सीमाओं को बढ़ाना था । यहां इनकी सोच रही होगी कि बाबर दौलत खां लोदी के बुलावे पर आया है दिल्ली जीत कर उसे देकर चला जायेगा तब दिल्ली को आसानी से फतह कर लिया जाएगा । और जब बाबर दिल्ली की तख्त पर विराजमान हो गया तब राणा सांगा को भी अपनी गलती समझ आई होगी कि बाबर के दिल्ली कूच के समय ही उसे रोकना चाहिए था इब्राहिम लोदी तो घर का ही था इससे कभी भी फरिया लेते । दूसरी तरफ बाबर को लगा होगा कि जिस राणा सांगा को अपने पड़ोसी की कोई चिंता नहीं जो अपने पड़ोसी का दुश्मन होगा वह मेरा भी दुश्मन हो सकता है ।
        अब बाबर और राणा में युद्ध होना ही था । इनके बीच 1527 में दो युद्ध हुए । पहले फरवरी के बयाना युद्ध में राणा के पराक्रम के आगे बाबर टिक नहीं सका किंतु शीघ्र ही दूसरे युद्ध की तैयारी शुरू कर दिया ।मार्च में खनवा के युद्ध में दोनो की सेनाएं आमने सामने थी । राणा की राजपूती सेना तलवारों के साथ थी जब कि बाबर की सेना तोप और बारूद के साथ । राणा अस्सी घावों के बावजूद वीरता के साथ लड़े । अंततोगत्वा उन्हें पराजित होना पड़ा ।
     राणा सांगा के बाद उनकी एक रानी कर्णावती के हाथो में राज्य का संचालन आया । इसी रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह द्वारा मेवाड़ पर आक्रमण किए जाने पर  बाबर के पुत्र हुमायु को राखी भेजी थी और हुमायू हिंदू मुस्लिम का भेद किए बिना रानी की मदद को चल पड़ा । यद्यपि हुमायूं के समय पर पहुंचने में विलम्ब हो गई और रानी ने जौहर कर लिया। किंतु देर से ही सही हुमायूं   पहुंचा और बहादुर शाह को पराजित कर मेवाड़ की सत्ता राणा सांगा के वंशज को देकर राखी की लाज बचाई । यहां हिंदुत्व भी खारिज हो जाता है क्योंकि हमायु ने एक हिंदू के पक्ष में एक मुस्लिम को पराजित किया । मतलब साफ है इस पूरे प्रकरण में राजनीतिक फायदे के लिए गड़े मुर्दे उखाड़ कर राष्ट्र, राष्ट्रीयता और हिंदुत्व के मुद्दे का सहारा ले कर अपना राजनीतिक एजेंडा ही नजर आता है।
        इतनी ही सच्चाई है कि अगर उस समय राष्ट्रीयता की भावना आ गई होती तो बाबर को विजय से दूर होना पड़ता । अफसोस कि 1192 पृथ्वीराज चौहान से लेकर 1526 होते 1857 तक राष्ट्रीयता की भावना का लोप ही रहा और बारी बारी से तुर्क, मुगल और अंग्रेज आते रहे और राष्ट्रीयता के अभाव में हम पराजित होते रहे ।