
मेरा गांव पंजवार
संजय सिंह/सिवान:साभार फेसबुक वॉल
कोरोना ठहरा हुआ है । पहले पॉजीटीव के घरवालों का टेस्ट हो चुका है । पड़ोसियों का भी । 150 से अधिक की रिपोर्ट निगेटिव आई है । सभी लोग अलग अलग स्थानों पर क्वारन्टीन में हैं । 22 पॉजीटीव लोगों का इलाज चल रहा है । सभी खतरे से बाहर हैं । कल एक व्यक्ति आई सी यू में गये थे । थोड़ी चिंता हुई थी । आज जेनेरल वार्ड में आ गये हैं । ठीक हैं ।
गांव सील है । ड्रोन कैमरे पहरा दे रहे हैं । वाच टावर लगा है । पुलिस पेट्रोलिंग बढ़ी है । लोग घरों में हैं । बीमारी और पुलिस दोनों के डर से ।
आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति होने लगी है । राशन, गैस और शब्जी लदी गाड़ियां गांव में घूम रही हैं । थोड़ी अव्यवस्था है । उम्मीद है 1 से 2 दिन में ठीक हो जाएगा । अभी भी पूरा गांव सैनीटाइज नहीं किया गया है । भाव ऐसा की गांव वाले चातक पक्षी हों और सैनिटाइज करनेवाले स्वाति नक्षत्र की बून्द बरसानेवाले । इस ओर ध्यान देने की जरूरत है ।
सरकार ने कोरोना प्रभावित गांवों के सघन सत्यापन का निर्णय लिया है । सभी जरूरी जांच भी होंगें । भरोसा है कि इसके लिये मुहूर्त नहीं निकाला जायेगा ।
पिछले 10 दिन हमारे लिये बहुत चुनौती भरे रहे हैं ।पंजवार का नाम सुनकर जिनका चेहरा खिल जाता था उनके मुस्कान भी कुटिल हो गये । कुछ लोगों ने पंजवार को वुहान की संज्ञा दे दी ।
पंजवार ग्राम-समुदाय का आदर्श है । 1940 से पुस्तकालय है यहां । आजादी की लड़ाई लड़नेवाले स्थानीय नायकों का यहीं जुटान होता था ।
1980 के दशक में गांव ने अपने सर पर खर पतवार ढोकर अपनी बेटियों के लिये हाई स्कूल बनवाया था । आज कस्तूरबा बालिका इंटर कॉलेज के रूप में जीवंत खड़ा है ।
1990 के शुरुआती वर्षों से संगीत कॉलेज चल रहा है गांव में । आज तक जितने पास किये सभी अध्यापक हैं । 100 प्रतिशत प्लेसमेंट वाला संस्थान ।
एक डिग्री कॉलेज भी है । किसी पूंजीपति ने नहीं बनवाया । एक संत ने जीवन भर की कमाई लगा दी । गांव के लोगों ने जमीनें दान दीं । मकसद बस इतना कि गांव के बच्चे भूजा-सतुआ खाकर भी उच्च शिक्षा प्राप्त कर लें ।
जब केबीसी का “के” नहीं था तब पंजवार ने सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता की शुरुआत की थी । आज इस आयोजन में पुरस्कार जीतनेवाले विद्यार्थियों को विशेष मान लिया जाता है । जो जीता वो सिकंदर बना । जो हारा उसने सिकंदर बनने के लिए संघर्ष किया । 25 वर्षों से पंजवार ऐसे प्रतिभाओं की खेती कर रहा है ।
ये सारे काम पंजवार ने अपना पेट काटकर किया है । अपनी पीढ़ियों के लिये । बिना एक पैसे का सरकारी सहयोग लिये ।
और भी बहुत कुछ है । लेकिन ज्यादा नहीं कहना । बस इतना कहना है कि हम हारेंगें नहीं । लड़ेंगें । सरकार का कंधा कमजोर पड़ेगा तो उसका बोझ बांट लेंगें । बस यही आग्रह था कि पंजवार को पंजवार ही रहने दीजिए । पंजवार पंजवार ही बने रहना चाहता है ।
संजय सिंह
पंजवार सिवान ।




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