जैसी करनी , वैसी भरनी का फलाफल है आर्थिक संकट : प्रमोद सिंह टुन्ना

छपरा (सारण): सबको मालूम था मंदी आएगी, सबको मालूम था नौकरियां जाएंगी और मैं ऐसा चाहता भी था। एक मिनट, मंदी आए ये नहीं चाहता था, जिस मंदी की नींव बीजेपी सरकार ने पिछले कार्यकाल में रखी थी, वह बीजेपी की सरकार में ही आए ये चाहता था। लोकसभा चुनाव के दौरान मैं दोस्तों और कलीग्स से कहता फिर रहा था, ‘मैं चाहता हूं बीजेपी की सरकार फिर बने।’ इसपर चर्चा भी करते थे और तब भी मैंने ऐसा कहने की वजह घिसती अर्थव्यवस्था बताई थी।

ये बातें आम आदमी पार्टी के जिला प्रवक्ता प्रमोद सिंह टुन्ना ने कही। उन्होंने कहा कि – मैं चाहता था कि बीजेपी दोबारा सत्ता में आए क्योंकि पहले पांच साल पहले से चल रही योजनाओं और आर्थिक ढांचे के दम पर आसानी से निकल गए। बीजेपी के सामने वैसी स्थिति नहीं आई जैसी मनमोहन सरकार के सामने वैश्विक मंदी के वक़्त आई थी। उल्टा बीजेपी सरकार ने खुद अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ने के ज़रूरी इंतज़ाम पिछले कार्यकाल में कर दिए। ऐसे में बीजेपी का किया, इनको ही भरना चाहिए ना! असली चुनौती तो अब सामने आई है।

श्री टुन्ना ने कहा कि बीजेपी ने पहले रोजगार के नाम पर ठेंगा दिया फिर बेरोजगारी के आंकड़े देने ही बंद कर दिए। एयर इंडिया से लेकर बीएसएनएल तक खोखले होते गए। इस दौरान कोई मजबूत रणनीति नहीं, केवल कागज और टीवी पर दिखने वाले वादे किए गए। 5 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य ही तो है, इसका आधार कुछ नहीं। अर्थव्यवस्था मजबूत कैसे होगी? बुलंद इरादों से और सूटकेस की जगह झोले में लाए गए बजट से? काम करना पड़ता है, प्लानिंग के हिसाब से।

उन्होंने कहा कि बीजेपी सरकार और पीएम मोदी को जनता को भावनाओं में लपेटकर गुमराह करना अच्छे से आता है लेकिन कब तक? जो गोलमोल झोल अब तक हुआ है, अब आने वाली मंदी उसका आउटकम है। रोजगार के नाम पर पकौड़ा बेचने से लेकर ई-रिक्शा खरीदने तक की बात हुई लेकिन नया कुछ नहीं हुआ। ये चुनौती सरकार के सामने आने वाला वह सच है, जिसको छुपाने की हर कोशिश की गई। अब चाहे धारा 370 हो या चिदंबरम की गिरफ्तारी, बिगड़ते हालात पर किसी नई घोषणा का पर्दा नहीं डाला जा सकता।

श्री टुन्ना ने कहा कि तकलीफ इस बात की है कि इस सब में हज़ारों लोगों की नौकरियां जा रही हैं। ऑटोमोबाइल से लेकर बिस्किट उद्योग तक की हालत खराब है। जब हम उद्योग बोलते हैं तो उससे जुड़े सभी कर्मचारी भी इसमें शामिल होते हैं। यही हालत सरकारी संस्थानों की थी तो खबरें हल्की थीं, अब मामला हाथ से निकला है तो खबरों में वजन आया है। बाकी पूरी जनता भी बेचारी और बेकसूर नहीं है। ये जवाब उस जनता को भी है, जिसे ‘वाह-वाह’ कहने से फुरसत नहीं और जो चाशनी में लिपटे ज़हर को मिठाई की तरह खाती रही है। ज़हर पेट तक पहुंचेगा, तो धीरे-धीरे ही सही.. असर तो करेगा ही।