ऐ रामऽ सुतल लहनी आँगानावाँ ,ऐ राम देवराऽ पापी —-‘——”””’—”””।
चैतावर बयार में चैता घांटो का धमाल पेठिया बाजार में 
#परमार अखिलेश #(सारण)
#भोजपुरी जनपदों में लोक संस्कृति की आत्मा को मर्म स्पर्शी लोकधुन चैता की धमक से चमक जाते हैं, झुर्रीदार चेहरे। यद्यपि बाजारवादी प्रभाव बाजार मूल्य की कीमत पर दो अर्थी लोकगीतों की आड़ लेकिन रहा है , बावजूद भोजपुरी जनपदों में चैतावर बयार व मयार मौसम है । बहरहाल,चार पहिये वाहनों से लेकर ग्रामीण चौपालों खेत खलिहानों बाजार पेठिया के दुकानों पर ‘ऐ रामऽ सुतल रहनी आँगानावाँ ऐ रामऽ देवराअऽ पापी,देवरा पापी निरखे बदनवाँ हो रामऽ देवरा पापी! सुर टेक ताल दादरा खेमटा कँहरवा दीपचंदी वे धमार पर धमाल मच रहे हैं ।हाँ गवईं चौपाल व देवालय दृश्य रूप में दू गोला व एक टोला से प्रायः बंचित होते जा रहे है। रामनवमी व सतुआनी पर  इस लोक गीतिक विरासत को जीवंत रखने का प्रयास होली रहा है।
क्या है चैता ,चैती व घाटो–भारतीय संस्कृति की लोक मान्यतानुसार विक्रम संवत् का  श्री गणेश का महीना चैत्र है । भोजपुरी जनपदों में इस माह गाए जाने वाला लोक गीत चैता ,चैती,घाँटो कहलाता है।
स्थान विशेषानुसार गौरी चैता, भीम चैता,दोआबा चैता व चैती ऐ पाँच लयात्मक मौसमी लोकगीत प्रचलित हैं ।
व्यास शैली में गायी जाती है चैता—–भोजपुरी अंचलों का लोकप्रिय लोकगीत चैता व्यास शैली में गायी जाने वाली कर्णप्रिय कोरस है । मुख्य गायक (व्यास)ठेकैता(ढोलवादक)तबालची (तबलावादक) से लेकर कलार्नेट तासा हुर्का केसियो सजिन्दो व झलकुटिए व्यास (मुख्यगायक)के संगीतकार होते है,जो सम पर टेक देते हैं । व्यास पंचम स्वर में ‘ऐसा रामऽ सुरऽसती मतवा ऽऽऽ जोड़िला दूनो हाथवा हो रामऽ कंठे सुरवे का समग्र देता है तो संगतकार टेक में ऐऽ रामऽ कंठे सुरवेऽ दुहराते हैं और स्वर के साथ सरगम व ताल पर झाल करताल झंझ से वातावरण झंकृत होली उठता है ।
चैता का संगीत शास्त्रीय विधान —–व्यासशैली के तहत सारण व वीर कुँवरसिंह गाथा को स्वरबद्व करने वाले ठाकुर उदय नारायण सिंह,साहित्य व संगीत के मर्मज्ञ मनीषी डॉक्टर राजेश्वर सिंह राजेश व लोकगीत गायकी में राष्ट्रपति से सम्मानित सुरेश सिंह संगीताचार्य दिलीप कुमार सिंह चैता व जैती को एक ही राग के दो स्वरूप मानते है। चैता विलंबित स्वरूप से शुरू होकर ताल चाँचर, कहँरवा, दीपचंदी और ताल धमार पर ताल ई जइता हऽ परंगों गिरता है । जबकि चैती द्रूत स्वर में गायी जाती है। बिहरेली अम्बिका भवानी ऐ रामऽ आदमी नगरऽमें उक्त चैती को संगीत शास्त्री नागेन्द्र कुमार वर्मा के अनुसार यह लोकगीत चैती राग यमन (बिहरेली अम्बिका भवानी )शुरू होता है । हो रामऽ आदमी नगर में वृंदावन सारंगपुर थाट के अन्तर्गत है। 14मात्रा ताल दीपचंदी से शुरू होती है।
व्यास शैली है क्या—यद्यपि व्यास शैली हिन्दी साहित्य व मध्य कालीन भारतीय इतिहास के भक्ति अन्दोलन की देन मानी जाती है।रामलीला व रामायण गायन व्यासशैली में ही मान्य है। जहाँ कोरस गायन में मुख्य गायक की भूमिका गौण है ,वहीं व्यास शैली व्यास की भूमिका मुख्य है ।मुख्य गायक (व्यास)के संगीतकारों में साजिन्दे विश्वास झलवहियों की संख्या 100तक होती है ।
व्यासशैली व व्यासों पर बाजार वादी प्रभाव ——ग्रामीण गायन मंडलियों के यौवन का गलाघोंट कर बाजार वादी उपभोक्ता संस्कृति ने व्यासशैली के स्वरूप को बदल दिया है। यद्यपि  बडका बनेआ दरियापुर निवासी स्वर्गीय व्यास वीरेन्द्र सिंह भोजपुर के स्वर्गीय व्यास गायत्री ठाकुर बलिया यूपी के स्वर्गीय व्यास वीरेन्द्र सिंह धुरिआन,गुलाब शर्मा, बेंचू मियाँ आदि ने फिल्मी गजल कव्वाली बिरहा को समावेशित कर व्यास शैली को परिमार्जित की। जिस लीक पर बच्चा सिंह,रामपुलिस राय,महातम तिवारी महान,प्रेमसागर मिश्र,कमलाकांत मिश्र जलेश्वर सिंह भरत शर्मा चलते दिखाई दे रहे हैं । 1990 से व्यासशैली पर बाजारवाद कैसेट्स कम्पनियों के जरिए हावी हुआ। गौतम तूफान रमाशंकर यादव विजेन्द्र गिरि,तपेश्वर चौहान राधेश्याम रसिया सुमन सिंह संजीत सुरिला अरूण अलबेला झुनझुन पासवान वीरेन्द्र पासवान स्वयंभू व्यास स्वयं सट्टा पर व आॅडियो वीडियो पर चैत्र का बहार बेंच रहे हैं । हाँ खेसारी लाल यादव की सिने जगत में प्रोन्नति से भोजपुरी लोक गायकों में प्रतिस्पर्धा साकारात्मकता की ओर इंगित है ।