​दहेज एक अभिशाप ।।साहित्य में कविता का एक अलग ही महत्व है। जिसमें छंद के साथ रस भी मौजूद रहता है ।कविता कवियों के हृदय में उठ रही वेतनों की आवाज है, प्रस्तुत है एक कविता जिसका शीर्षक दहेज प्रथा ।
संकलन:- नौशाद आलम 
प्रस्तुति :-कुंजबिहारी शास्त्री “दैनिक खोज खबर “जिला संवाददाता, मधेपुरा 

दहेज प्रथा 


हमारे पूरे समाज में 
एक विकराल राक्षस का 
रूप धारण कर 
सुरसा सा मुँह लिए 
हमारी बहु- बेटियों को 
एक ही क्षण में लील जाता है 
कितनों की इहलीला 
समाप्त कर यह 
अपने आकार को 
और भी बड़ा कर 
बढ़ता चला जाता है 
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
इसके बढ़ते हुए आकार 
और इसके बढ़ते हुए 
मनोबल को घटाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
अपने संकल्पों द्वारा 
इस कुरीति के खिलाफ 
और सुर में आवाज उठाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
इस अभिशाप नामक 
पारंपरिक प्रथा को खतम कर 
उन लालची भेड़ियों का 
दिमाग सही जगह पर लाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
समाज से ऐसे कलंक 
और ऐसी कुरीति को 
जड़ से मिटाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
दहेज की आग में झुलसी 
उन बेबस, कमजोर 
और लाचार के बुझे मन में 
आशा का दीप जलाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ 
का संदेशा 
हर एक शहर ,
हर एक गाँव ,
हर एक गली और 
हर एक घर तक पहुँचाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
पूरे समाज को जागृत कर 
अपनी बहु- बेटियों के 
जीवन को बचाने का 
प्रयास करें हम 
उनके आने वाले कल 
और आज को सजाने का ।
आओ मिलकर 
प्रयास करें हम 
दहेज रूपी इस कलयुगी 
दानव के विनाश हेतु 
मुख्यमंत्री द्वारा दहेज प्रथा
उन्मूलन का हिस्सा बनकर 
इस मुहिम को 
आगे तक ले जाने का ।

  •           रेशमा रानी (कवियत्री) 
  •              न.शि.म.वि.बलिया 
  •                     ( बेगूसराय )