सर्वेश तिवारी श्रीमुख का एक और बाउंसर–” मैं भाग्यशाली हूँ कि गांव में हूँ।”
✍”दैनिक खोज खबर” ऑन-लाईन हिन्दी न्यूज वेबपोर्टल के लिए श्रीनारद फाउंडेशन सीवान:– टीवी की स्क्रीन पर योद्धा की तरह गरजता एंकर चिल्ला चिल्ला कर बता रहा है कि फलां शहर में इतने व्यक्ति जाड़े से मर गए। यह योद्धा इतना चिल्लाता क्यों है, यह समझ नहीं आता। शायद इसे लगता है कि इस देश की व्यवस्था को चिल्ला कर ही ठीक किया जा सकता है।
देश अब तक सिर्फ इसी कारण पिछड़ा है कि लोग चिल्लाते नहीं। यदि देश के सवा सौ करोड़ लोग एक साथ चिल्ला दें, तो पलभर में भारत अमेरिका को कर्ज देने लायक स्थिति में आ सकता है। या यह भी हो सकता है कि चिल्लाने से ही इस योद्धा का वेतन तय होता हो। नौकरीपेशा आदमी की सबसे बड़ी पीड़ा यही है कि उसे स्वामी की इच्छा पर चिल्लाना पड़ता है। जैसे पालतू…
मैं टीवी के नगरीय समाचारों से ऊब कर अपने गांव की ओर आंख फेरता हूँ, खेतों में अब सरसो में फूल लगने प्रारम्भ हो गए हैं। धरती अब धीरे धीरे पीली हो रही है, जैसे मेंहदी का रंग चढ़ रहा हो। खरवांस समाप्त होने को है, मकर संक्रान्ति के बाद वैवाहिक लग्न प्रारम्भ हो जाएंगे। पीले रंग में रँगी धरती उस लड़की जैसी लगती है, जिसका दो तीन दिन में ही ब्याह होने वाला है। पीली चुनरी ओढ़े, हाथ मे मेंहदी का रंग और देह पर हल्दी की आभा… पवित्रता की मूर्ति। कभी किसी लगन लगी हुई लड़की को देखिए, वह सुंदरता आपको डेढ़ किलो क्रीम पोत कर तैयार हुई किसी हीरोइन में भी नहीं दिखेगी।
इस भीषण शीत में भी गांव पर लगन चढ़ गया है। मैं मोन पारता हूँ कि मेरे गांव का वह कौन अंतिम व्यक्ति था जो ठंढ के कारण मरा था। मेरी आयु तीस की हो चली है, पर मुझे ऐसे किसी व्यक्ति का स्मरण नहीं। गांव में लोग ठंढ से नहीं मरते। अलाव, पुआल का बिछावन, जूट के बोरे का ओढ़ना, अनेकों उपकरण हैं जिनके बल पर एक गांव का गरीब जाड़े को धोबियापाट लगा कर कहता है- भग जा ससुर, यहां तेरा क्या काम!
मुझे कई बार अनुभव होता है, किसी अन्य के खेतों में भी फूली सरसो या गेंहू की फूटती बालियों को देख कर देह में गर्मी आ जाती है। एक आम ग्रामीण छोटी मोटी ठंढ तो इसी गर्मी के बल पर काट लेता है।
गांव का दरिद्र बैंक के कर्जे के भय से भले मर जाय, भूख या ठंढ से कभी नहीं मरता। जब तक गांव के एक भी व्यक्ति के बखार में अन्न का एक भी दाना है, तबतक गांव का अंतिम व्यक्ति भूख से नहीं मर सकता। वैसे गांव का किसान बैंक के कर्जे के भय से क्यों मर जाता है, यह शोध का विषय है, क्योंकि जो कृषक कथित रूप से क्रूर और शोषक साहूकारों के युग में कभी आत्महत्या नहीं करता था, वह तथाकथित उदार बैंकों के युग में क्यों आत्महत्या को विवश हो जाता है, यह मेरी समझ के बाहर है। आधुनिक व्यवस्था ने गांवों को “मृत्यु” का ही उपहार दिया है शायद। लोकतंत्र में किसानों की मृत्यु विपक्ष को सत्ता में लाने का सर्वश्रेष्ठ उपकरण है, कौन जाने…
गांव जैसे जैसे कस्बों में बदलते हैं, भूख और ठंढ प्रभावी होने लगती है, और जैसे ही गांव पूरी तरह शहर बनते हैं भूख और ठंढ प्राणघातक हो जाते हैं।
गांव दरिद्रता में भी दमकता है, शहर सम्पन्नता में भी सहम कर जीता है। तनिक सोच कर देखिये तो, गांवों के नगरीकरण से गांवों का क्या लाभ मिलता है? गांवों को नगर इसलिए बनाया जाता है ताकि शहर में बैठे बड़े पूंजीपतियों को लाभ हो। गांव को शहर बनाते ही दतुअन करने वाले किसान को पेस्ट की लत लगाई जाती है। पानी से ही नहा लेने वाले किसान को शैम्पू और साबुन के नशे में धकेल दिया जाता है। उसके दिमाग मे भर दिया जाता है कि यदि तुमने डिटॉल से हाथ नहीं धोया तो तुम्हें बीमारी हो जाएगी। एक दिन असित भाई ने कहा था- जबतक कम्पनियां लोगों के दिमाग में यह बात नहीं भर देतीं की बालों में डैंड्रफ होना पिछड़ेपन की निशानी है, तबतक उनका एन्टी डेंड्रफ शैम्पू नहीं बिकेगा। आम आदमी का ब्रेनवाश कर के ही बाजार मजबूत होता है।मोटरसाइकिल, मोबाइल, टीवी, ब्रांडेड कपड़े, जूते, तेल, शैम्पू, नकली शिक्षा की दुकान स्कूल… बाजार बेचारे गरीब को नशे के दलदल में ऐसे धकेलता है कि असहाय किसान मजदूर बन जाता है। उसके बाद मिलती है घुटन की जिंदगी, और अंत में कायर मौत।
शहरीकरण ने गांवों को उपहार में आत्महत्या की लत दी है।
अक्टूबर के महीने में बिहार के शिक्षमन्त्री ने आदेश दिया कि सभी शिक्षकों को दीवाली के पहले एक माह का वेतन दिया जाय। वह एक माह का वेतन दीवाली के तीन महीने बाद आज मिला है हमें। जून के बाद सीधे जनवरी में वेतन मिला, और वह भी एक माह का। यदि मैं शहर में होता तो कब का भूखों मर गया होता, पर गांव में हूँ इसलिए अब भी जमींदारों की तरह जी रहा हूँ।
मैं अब भी पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि यदि सरकार गांवों से अपने सारे शहरी उपकरण खींच ले, तो अगले दस वर्षों में ही गांव आत्मनिर्भर होंगे। भारत जब तक गांवो का देश था तबतक विश्वगुरु और सोने का पक्षी था, पर जैसे ही वह शहरों की ओर भागा उसके हाथ मे कटोरा आ गया।
पूंजीवादी सरकारों की कृपा से गांवों में भी गांव कम ही बचे हैं, पर जितने बचे हैं वे अब भी दुनिया को जीना सिखा सकते हैं, पर परमाणु बम बनाने के तरीके सीखने वाली दुनिया में मनुष्य की तरह जीने की चाह है किसे।
मैं एक बार फिर टीवी के परदे की ओर देखता हूँ। चिल्ला रहे एंकर की ठंढ से मरने वालों की लिस्ट में कुछ संख्याएं और बढ़ गयी होंगी, पर मुझे विश्वास है कि मेरे खेत में सरसो की मुस्कान बिल्कुल भी कम नहीं हुई होगी।
मैं भाग्यशाली हूँ कि गांव में हूँ। सर्वेश तिवारी श्रीमुख गोपालगंज, बिहार।





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