सिलाव का खाजा, रसगुल्ले से भी पुराना इतिहास है खाजा का
#कुमुद रंजन सिंह

#नालन्दा
खाजा एक ऐसी मिठाई जिसके बगैर बिहार में कोई मांगलिक कार्य संपन्न ही नहीं होता है। शादी के बाद जब नई नवेली दुल्हन अपने पिया के घर जब आती है तो अपने साथ में सौगात के रूप में खाजा मिठाई जरूर लाती है और इसी खाजा को पूरे मोहल्ले टोले में बांटा जाता है। खाजा अपनी कई खूबियों की वजह से घर-घर में लोकप्रिय है। हां ये बात जरूर है कि बदलते वक्त के साथ खाजा को भी फास्ट फूड और पश्चिमी सभ्यता के प्रभाव की वजह से काफी संघर्ष करना पड़ रहा है लेकिन फिर भी खाजा की बात निराली है। राजगीर और नालंदा के बीच स्थित सिलाव नामका स्थान है। सिलाव का जिक्र होते ही यहां के खाजा का स्वाद याद आ जाता है। दरअसल यहां का खाजा बेहद खास होता है। कुल 52 परत वाली ये खाजा बहुत ही खास्ता होता है।

सिलाव के खाजा की पहचान दूर देशों तक भी फैली हुई है। देसी और विदेशी सैलानी जब कभी राजनीर और नालंदा घूमने के लिए आते हैं तो वे अपने साथ सिलाव का खाजा भरपूर मात्रा में पैक करा कर ले जाना बिल्कुल नहीं भूलते हैं। आंकड़ों के मुताबिक सिलाव में खाजा का सालाना कारोबार 5 करोड़ से अधिक का का रहता है। खाजा के मशहूर निर्माता काली साह के नाम पर सिलाव में अभी भी कई दुकानें चल रही है। जानकारों की माने तो बुद्ध काल से ही सिलाव में खाजा निर्माण की कला विकसित हुई थी। काली शाह के वंशजों ने आज भी इस विरासत को संभाल कर रखा है।
खाजा यानि खूब खा और जा। खाजा के बारे में प्रचलित एक मुहावरे को आपने भी जरूर सुना ही होगा। अंधेर नगरी चौपट राजा, टके सेर भाजी टके सेर खाजा। जानकारों की माने तो खाजा का इतिहास रसगुल्ले से भी पुराना है। खाजा इसलिए भी खास है क्योंकि ये एक ऐसी मिठाई है जो घर में कई दिनों तक रखने के बाद भी जल्दी खराब नहीं होता और सिलाब के खाजे की तो बात ही जुदा है। सिलाव के खाजे की कई लोगों ने नकल करने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो पाए। आपको जानकर खुशी होगी की दिल्ली के प्रगति मैदान में हर साल ट्रेड फेयर में खाजा का स्टॉल सजता ही है।
अन्य मिठाइयों की तुलना में खाजा की कीमत काफी सस्ती है। सिलाव में खाजा की कीमत 100 रुपये किलो तक हैं।
साल 2015 में बिहार सरकार की तरफ से खाजा को उद्योग का दर्जा दे दिया गया। मुख्यमंत्री कलस्टर विकास योजना में जोड़ा गया है। खाजा को विदेश में भेजने की भी योजना पर काम चल रहा है। हालांकि स्थानीय कारोबारियों का कहना है कि सरकारी योजनाओं का बहुत अधिक लाभ उनको नहीं मिल पाया है।