मनोकामना सिद्धि, तपो भूमि परिसर है मौनिया बाबा मंदिर परिसर
■समाधी लेने के बाद ही स्थल का नाम पड़ा मौनिया बाबा■बिहार का सुप्रसिद्ध मेला लगता हैं।■आज तक नही मिला राष्ट्रीय मेला का दर्जा।
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विकास कुमार की रिपोर्ट 
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सीवान/महाराजगंज 
हरि अन्नत हरि कथा अन्नता बिन हरि कृपा मिलही नही संता पक्ति सटीक भविष्यवाणी कर गयी और 18 सदी के अंत या19 सदी के प्ररम्भ मे दारौदा थाना क्षेत्र के सावान सतीमाई मंदिर के पास सर्व प्रथम बाल्या अवस्था ताम्रवर्ण,दुधीया ललाट आभा इतना तेज की देखने से ही मानों शांति व आन्नद की अनुभूति प्राप्त होती थी,बाल्या अवस्था में करीब 15 या 20 बर्ष की अवस्था मे ही अनवरत संत का दर्शन हुआ था।हमेशा तपस्या मे लीन रहते छोटा सा शरीर कुछ समय बाद पकवलिया आए, कुछ बर्ष बाद किसी बात को लेकर अनुमंडल शहर के सिहौता बंगरा गांव के मध्य में स्थित सुनशान जंगल झाड़ वट वृक्ष के नीचे आ रहने लगे घोर तपस्या की कुछ समय बाद अपने अनुवाईयो से बोले मै समाधी लूगा बात जंगल में आग की तरह फैली लोग हतप्रभ रह गए परन्तु लगभग 30 बर्ष की अवस्था में ही छोटे तन धारी श्री मौनिया बाबा समाधी ले लिया।समाधी लेने के बाद ऐसे ऐसे तपस्वी आए जिनकी ब्याख्या सुन रामायण महाभारत की कथा से बढ़कर सुख शांती की अनुभूति मिलेगी।उन्ही नामो मे एक नाम आता है अचल जी महाराज का जिनकी कथा आज भी हाजारो लोग आखों देखी बया कर सकते है।कुल मिलाकर मौनिया बाबा उसी स्थल को क्यू चयन किया समाधी लेने को, बड़े बड़े नागा साधुओं का आवागमन हमेशा ईस स्थल पर लगा है निष्कर्श यही निकला यह भूमि तपो स्थली, मनोकामना सिद्धी स्थल है।
समाधी स्थल पर लगता है आकर्षक मेला।
मौनिया बाबा के समाधी लेने के बाद 1923 से समाधी स्थल पर उत्तर बिहार का सुप्रसिद्ध मेला लगता है।प्रत्येक वर्ष भादो मास के आमावस्या से ही एक माह तक चलने वाला मेला लगता हैं।जहा लाखों की तायदाद मे मेला स्थल पर दर्शनार्थी पहुँचते है ।