मधेपुरा:प्रखण्ड कार्यालय चौसा में शिव चर्चा का भव्य आयोजन,उमरी लोगो की भीड़

⏭कुंजबिहारी शास्त्री “दैनिक खोज खबर” चौसा, मधेपुरा
आज चौसा प्रखंड कार्यालय परिसर स्थित शिव मंदिर में भव्य शिव चर्चा का आयोजन किया गया। जिसका उद्घाटन प्रखंड विकास पदाधिकारी मिथिलेश बिहारी वर्मा ने किया। समारोह को संबोधित करते हुए श्री वर्मा ने कहा कि शिव किसी के गुरु बनने के बाद सिर्फ उसके कर्मों की ही जिम्मेदारी नहीं उठाते बल्कि अपने शिष्य के सुख दुःख का ख़याल रखना भी शिव गुरु की जिम्मेदारी है जो कि वो बखूबी निभाते हैं।
वो कभी अपने शिष्य को निराश या उदास नहीं देख सकते क्यूंकि उनका शिष्य उनकी जिम्मेदारी है।कहा जाता है कि किस्मत में जो लिखा होता है वही होता है। हाँ ये सही है, पर तब तक ही जब तक महादेव सिर्फ भगवान् हैं।
भगवान् के रूप में वो अपने ही नियमों में बंधे हुए हैं कि जो उन्होंने लिख दिया है जो कि हमारे ही पिछले कर्मों का फल रहता है, उसको वो नहीं बदलेंगे लेकिन गुरु शिव में ये बात लागू नहीं होती क्यूंकि गुरु दया करते हैं।
दया का मतलब ही होता है किसी को वो दे देना जिसके वो लायक भी ना हो या उसके हिस्से का ना हो।मेरे कहने का मतलब कि मान लीजिए कि मेरी किस्मत में बारिश लिखी है, तो ऐसे में महादेव बारिश को नहीं रोकेंगे क्यूंकि बारिश मेरी किस्मत है, इसको वो नहीं बदल सकते लेकिन गुरु शिव मुझे उस बारिश से बचने के लिए एक छाता जरूर देंगे जो मुझे बचने में मदद करेगा और बारिश होते हुए भी मैं नहीं भींगूंगा।ऐसे में महादेव ने अपने नियम का पालन भी किया बारिश न रोक कर और अपने शिष्य के प्रति जिम्मेदारी भी निभायी छाता देकर।महादेव गुरु के रूप में हमे जीवन के सुखों का अनुभव कराते हुए कर्म करना सिखलाते हैं।वो ये नहीं कहते कि जंगल में या पहाड़ पे जा कर तपस्या करो।
पूर्व जिला परिषद प्रतिनिधि गुरु भाई मनोज राणा ने कहा कि जीवन एक ऊबड़–खाबड़ रास्ते जैसा है।इस रास्ते पे चलना तो है ही , अनिवार्य है चलना, पर हम सवारी तो अपने मन से चुन सकते हैं कि बैल-गाड़ी से जाएँ या कार से।जाहिर है कि इस ऊबड़ -खाबड़ रास्ते पे हम बैल -गाड़ी से जाएंगे तो धक्के लगते जाएंगे ,चोट खाते जाएंगे पर कार से जायेंगे तो आराम से जाएंगे चाहे रास्ता कितना भी ऊबड़ -खाबड़ क्यों न हो।
दिल्ली से आये गुरु भाई शैलेश जी ने कहा कि देखा जाता है कि लोग किसी संत महात्मा को अपना गुरु बना लेते हैं ,या घर की हमेशा से चली आ रही परंपरा के अनुसार किसी कुल गुरु को गुरु मानते हैं।मेरे कहने का मतलब कि किसी इंसान को अपना गुरु बनाते हैं लोग लेकिन इंसानी गुरु जो होते हैं उनकी एक सीमा होती है ,वो तो खुद इंसान हैं चाहे कितने भी धार्मिक या पहुंचे हुए क्यों न हों और उन् इंसानी गुरुओं के खुद भी तो कोई अपने गुरु रहे होंगे।उन्होंने अपने गुरु से सीखा, फिर अपने शिष्यों को सिखा रहे यानी खुद भी कहीं से सिख कर ही सिखा रहे।इंसानी गुरु अपने शिष्यों का सम्बन्ध भगवान् से स्थापित करवाने की शिक्षा देते हैं ,मार्ग बताते हैं, यानि कि हमलोग को भगवान् से जुड़ने के लिए किसी अन्य व्यक्ति का मार्गदर्शन लेना पड़ता है।हमारे और भगवान् के बीच कोई तीसरा आ जाता है।
वो जैसे बताता है हम वैसा करते हैं ।यानी कि हम किसी तीसरे को बीच में लाकर खुद में और भगवान् में दूरियां ही तो बढ़ाते हैं और इंसानी गुरु हमेशा हमारे साथ नहीं रह सकते।जब तक सामने बैठे हैं उनसे अपने प्रश्नों के उत्तर पूछ सकते हैं या जब तक गुरु जिन्दा हैं तब तक ही फिर क्या होगा। इंसानी गुरु भी तो आखिर महादेव को ही पूजते हैं तो हम इतनी लम्बी सीढ़ियां चढ़ कर क्यों जाएँ महादेव के पास। किसी और के द्वारा क्यों जाएँ।क्यों ना हम सीधा शिव जी को ही अपना गुरु बना लें। उन्होंने “अब मोरी राखो लाज हरि, लागे चुनरी में दाग छुड़ाऊं कैसे। जब हम पैदा हुए, जग हँसे, हम रोए, ऐसी करनी कर चलो हम हँसे,जग रोये , दर्शन लागे तोरा बिन मन लागे ना जिया” जैसे भक्ति गीतों को गाकर लोगों में अध्यात्म की जागृत कर लोगों झूमने को मजबूर कर दिया। इसके अलावा उन्होंने ठुमरी,चैती, दादरी जैसे लोक धुनों पर आधारित भक्ति गीत और गजल को भी प्रस्तुत किया।
गुरु भाई विद्यानंद पासवान ने कहा कि वो शिव जी जिन्होंने जीवन को बनाया है, उनसे बेहतर कौन सिखा सकता है जीवन जीने की कला। वो शिव जी जिन्होंने इंसान के “मन” को बनाया है, उनसे बेहतर कौन सिखा सकता है मन को काबू में करना।
इस मौके पर बीडीओ श्री वर्मा की पत्नी रंजू कुमारी, सुरेंद्र कुमार सहयोगी, घनश्याम मिस्त्री, सुभाष भगत, राजकिशोर पासवान, संजय कुमार संजू, प्रखंड नाजीर मनोज राम, नासिर आलम समेत दर्जनों लोग उपस्थित थे।




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