भाजपा के किलों पर कांग्रेस का कब्जा, मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट ने कांग्रेस से छिनी सत्ता
चुनाव डेस्क/दैनिक खोजख़बर/मनोकामना सिंह : देश के पांच राज्यों में हुये चुनाव में मतदातओं ने भाजपा को नकार दिया.वहीं राजस्थान , छतीसगढ़ और मध्यप्रदेश में कांग्रेस की वापसी ने आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की नैया पार लगाने की मोदी-शाह की जोड़ी का मिशन पर ब्रेक लगता दिख रहा हैं.मध्यप्रदेश , राजस्थान और छतीसगढ़ में छोटे दलों ने कई सीटों पर भाजपा व कांग्रेस के सियासी समीकरण जिसतरह से बिगाड़ दिया, उससे भाजपा को फिर से राजग गठबंधन को एकजुट करने के लिए पीछे मुड़ने का दबाव रहेगा.जबकि भाजपा हाल के दिनों में अपने गठबंधन दलों को तरजीह देना कम कर दिया था.पांच राज्यों के चुनाव परिणाम में कांग्रेस के वनवास खत्म कर भाजपा के किलों पर कांग्रेस का कब्जा, मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट का दस वर्षो बाद कांग्रेस से सता छीन पुनः वापसी हुयीं हैं, जबकि तेलंगाना में केसीआर का फिर जादू चला.कांग्रेस ने सहयोगियों के साठ राजस्थान में 200/101,मध्यप्रदेश में 230/115 और छतीसगढ़ में 90/68 सीटें जीतकर सरकार बनाने जा रही हैं.जबकि तेलंगना में 119/88 सीटें जीतकर टीआरएस और मिजोरम में मिजो नेशनल फ्रंट 40/26 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बना रही हैं। इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम के पूर्व कई राज्यों में लोकसभा के उपचुनावों में भी भाजपा को करारी शिकस्त मिली थी, लेकिन भाजपा ने सुधार प्रक्रिया जारी रख आम लोगों पर चोट करती रही.जिसका नतीजा पांच राज्यों के चुनाव में वोट के चोट से जनता ने अपनी इच्छा जाता दी.रजनीतिक विश्लेषण का दौर जारी हैं.जिसमें एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ अध्यादेश लाकर परम्परागत सवर्ण वोटरों को नाराज़ करना मुख्य कारण बताया जा रहा हैं.फिलहाल मोदी के लिए 2019 का फाइनल मुकाबला जीत की राह में कांग्रेस के वापसी से बढ़े मनोबल का मुकाबला भी आसान नहीं रहेगा.मध्यप्रदेश और राजस्थान में सवर्णों की नाराजगी से नोटा का इस्तेमाल और मामूली वोट प्रतिशत से भाजपा सता से दूर हो गयीं.इससे साफ होता हैं कि ये नाराजगी लोकसभा चुनाव में बरकार रहा तो हिन्दी पट्टी राज्यों में भाजपा को नुकसान हो सकता हैं.वहीं कांग्रेस का विपक्षी गठबंधन करने का मिशन सफल हो गया तो भाजपा वाजपेई सरकार के 2004 का शाइनिंग इंडिया का इतिहास दोहरा सकती हैं और सता से विपक्षी एकता इनको दूर रखने में कामयाब हो सकता हैं, फिलहाल पार्टियां चुनाव परिणामों की समीक्षा में लगी हैं.आगे राजनीतिक शतरंज की बिसात पर कौन बादशाह बनता हैं, ये देखना बाकी हैं.