बिना मद बिना मोह वाले मालवीय
✍संजय कुमार सिंह 
   ( पूर्व छात्र BHU)
🅿प्रस्तुति: श्रीनारद फाउंडेशन : सीवान 

1996-97 की बात है । मालवीय भवन में मालवीय जी की जयंती मनाई जा रही थी । काशी नरेश मुख्य अतिथि थे । हाथी पर सवार होके आये थे । सबके सम्बोधन के बाद उनकी बारी आई । उन्होंने  कहा था कि बी0एच0 यू0 की स्थापना इसलिए हो सकी,  क्योंकि अगुआ वो मालवीय था जिसके पास मद नहीं था , मोह नहीं था – मदन मोहन मालवीय ।
बी0 एच0 यू0 को छोड़े बरसों बीत गये । लेकिन कहां छोड़ पाया हूँ ! आज भी सब कुछ तरो ताजा है दिमाग में । जैसे कल ही कि बात हो । हॉस्टल से फैकल्टी, फैकल्टी में क्लास, क्लास में समझ, समझ को विस्तार देने के लिए सेन्ट्रल लाइब्रेरी । लाइब्रेरी में घंटों कैसे बीत जाते थे पता ही नहीं चलता था । कुछ चेहरे रोज दिखते थे । मेज की खड़ी पटरियों के नीचे किताबों में खुद को डुबोये हुए । यहीं चेहरे हमारे आदर्श होते थे । गर्मियों में पढ़ते पढ़ते नींद भी आने लगती थी । कुछ देर के लिए बाहर निकलना होता था । चाय पीना , मंदिर के एक दो चक्कर लगाना , कभी- कभी भजन सुनना और फिर लाइब्रेरी आ जाना । उस जिंदगी से बेहतर कोई जिंदगी नही लगी आज तक ।
सोचता हूँ कि कैसे अकेला आदमी उतना बड़ा संस्थान खड़ा कर सकता है ? लोगों ने कितना विश्वास किया होगा उनमें । जिन राजा महाराजाओं की छवि शोषकों की तरह प्रस्तुत की जाती थी उन्हीं में से तो थे- काशी नरेश भी । दरभंगा नरेश भी । इतना सब कुछ क्यों दे दिया दान में एक याचक को ? महात्मा गांधी क्यों कहते हैं कि- मालवीय जी मुझसे भी बड़े भिखारी थे ? जवाब मिलता है मालवीय जी के जीवन से ही । त्याग , समर्पण, आचरण, चरित्र व स्पष्ट उद्देश्यों से ही लोग मालवीय बनते हैं । तब जाकर कोई मुरादाबाद का गरीब मुसलमान हिंदू विश्वविद्यालय के लिए 5 रु0 चंदा देता है । तब जाके कोई मुजफ्फरपुर की भीख माँगनेवाली महिला दिन भर की भीख मालवीय जी को चंदे में दे देती है । 
जन्मदिन के अवसर पर शत शत नमन इस महान कर्मयोगी को जिनके होने से लाखों करोड़ों लोगों की जिंदगियां बदल गईं ।