*पुरबी के बेताज़ बादशाह – – महेंदर मिसिर .*
♨कलकत्ता के मशहूर तवायफ सोना बाई गावत रहली .
माया के नगरिया में लागल बा बजरिया ,
ए सुहागिन सुन हो .

गीत खतम भइल . सब लोग ताली बजावल . एगो सज्जन चुप चाप बइठल रहले . सोना बाई के उनकर इ व्यवहार चुभ गइल . उ तुनकि उठली .
लागत बा रउआ के हमार गीत पसन्द ना आइल हा
ऊ सज्जन आपन मुखार बिन्द खोलले ,
राउर अलाप गज़ब बा , आवाज में कशिश बा ; लेकिन स्वर में आरोह अवरोह के कमी बा .
सोना बाई चमक के कहली ,
रउवा अइसे कहतानी कि जइसे खुद तानसेन होइँ .
ऊ सज्जन तानपुरा लेई के वो ही गीत के अपना अंदाज में गवलन . एमे गायकी में अलाप भी रहे , आवाज में कशिश भी रहे आ संगे संगे आरोह व अवरोह भी रहे . सुनके सोना बाई मन्त्रमुग्ध हो गइली . पुछलि ,रउआ के हईं ? पता चलल कि ई पुरबी के बेताज़ बादशाह महेंदर मिसिर हवे . जवन गीत सोना बाई गावत रहली हा ऊ महेंदर मिसिर के लिखल ह .
महेंदर मिसिर के कंठ से आवाज जब फूटत रहल हा त बुझात रहल हा कि पूरा सृष्टि रुक गईल बिया . अइसन कवनो वाद्य यन्त्र ना रहे जवना के ऊ ना बजावत रहले . अइसन गाये व बजाये वाला महेंदर मिसिर के जनम छपरा , विहार के मिश्रवलिया गाँव में भइल रहे . ओ घरी उनकर गीतन के धूम छपरा , मुजफ्फरपुर , बनारस आ कलकत्ता तकले रहे . बाई जी लो के पहिला पसंद महेंदर मिसिर रहले . उनकर लिखल गीतन के बाई जी लो गाई के गायिकी में कीर्तिमान स्थापित करत रहे लो . उनकर स्त्री मन के अभिव्यक्ति वाला गीत दुनियां के मोहि लेति रहे . ऐजा हम कुछ गीतन क मुखड़ा लिखतानि जवना में स्त्री मन के अभिव्यक्ति अपना चरम पर बा …
1. सासु मोरा मरलि रामा बाँस के छिकुनिया ….
2.अंगुरी में डसले बिया नगिनिया ए ननदो दियरा जरा द ..
3.आधी आधी रतिया बोले कोयलरिया …
4 .पटना से बैदा बोला द ….
5. नज़रा गइली गुइयाँ ….
6 . हमनी के रहब जानी दुनो परानी ….
महेंदर मिसिर लोक मानस से सम्बाद करत रहले . समाज के प्रचलित हर विधा पर उनकर लेखनी बेरोक टोक चलल बिया . प्रेम गीत , विरह गीत , भजन , निरगुन आदि सभ पर उनकर लेखनी सरपट दौड़ल बिया . यानि कि कहल जा सकेला …
कवन सभा जहाँ नारद नाहीं .
महेंदर मिसिर पहलवानी के साथ साथ घुड़सवारी भी करत रहले . जब ऊ घोड़ा पर बइठ के चलस त लोग सड़क के दुनो बगल खड़ा हो के उनकर घुड़सवारी के नज़ारा देखत रहे . कइसनो बिगड़ैल घोड़ा होखसु महेंदर मिसिर उनकरा के साधि लेत रहले .
महेंदर मिसिर भिखारी ठाकुर से उमिर में बड़ रहले . भिखारी ठाकुर महेंदर मिसिर के आपन गुरु मानत रहले . हमार परम मित्र भगवती प्रसाद द्विवेदी ( दल छपरा , बलिया ) आपन एगो किताब में ई उल्लेख कइले बाड़े कि भिखारी ठाकुर महेंदर मिसिर के अतना बड़ भक्त रहले हा कि उनकर झोला लेके चलस आ उनकर पाँव दबावसु . ओ घरी के गुरु शिष्य के ई परम्परा रहे . महेंदर मिसिर के बारे में विस्तार पूर्वक जाने खातिर कुछ किताबन के हम सन्दर्भ देतानि शायद ई सब किताब दिल्ली के कनाट प्लेस में मिली जाइ .
1. पाण्डेय कपिल के उपन्यास “फूल – सूंघी “.
2. राम नाथ पाण्डेय के ” महेंदर मिसिर ”
3.रवीन्द्र भारती के ” कम्पनी उस्ताद “.
4.डॉ सुरेश कुमार मिश्र के ” कविवर महेंदर मिश्र के गीत संसार ”
एकरा आलावा आरा जिला ,गाँव -पियरो के चंदन तिवारी महेंदर मिसिर पर एगो गीत श्रृंखला निकलले बाड़ी ओकरे के सुने के चाहीं .
महेंदर मिसिर स्वतंत्रता सेनानी भी रहले . क्रान्तिकारियन के मदद आ अंग्रेजी साम्राज्य के अर्थ ब्यवस्था के ध्वस्त करे खातिर ऊ जाली नोट भी छापत रहले . पकड़ाइला के बाद उनका के बक्शर जेल में राखल गइल . कहल जाला कि छपरा , मुज्जफर पुर , बनारस ,पटना आ कलकत्ता के सब बाईजी लो एकजुट व एकमत होइ के ब्रिटिश सरकार से ई अनुरोध कइले रहे कि महेंदर मिसिर के बराबर रुपया देबे खातिर उ लोग तैयार बा लेकिन महेंदर मिसिर के छोड़ दिहल जाउ . हमनी के गीत संगीत मरी जाइ यदि महेंदर मिसिर ना रहिये त .गीत संगीत के ई असर होला . जेल में गइला के बाद मिसिर जी पूरा रामायण भोजपुरी में काव्य के माध्यम में लिख दिहले . जेल में जब ई अलाप लगावसु त सुने खातिर अंग्रेज जेलर के मेहरारू इनकरा कोठरी के पास चलि आवसु . जेलर के मेहरारू के दबाव व महेंदर मिसिर के आपन अच्छा व्यवहार के वजह से ईनका के बहुत पहले छोड़ि दिहल गइल . जेल से छुटल महेंदर मिसिर आज़ादी के सूरज ना देखि पवले . 26 अक्टूबर सन् 1946 के दिने माया के बजरिया छोड़ के महेन्दर मिसिर सदा के लिए उहवाँ चल गइले जहवाँ उनकर गीतन के , सुर के , अलाप के हमनी से ज्यादा जरूरत रहे .
~ शंकर दयाल ओझा .
👉इनपुट: आखर भोजपुरी ई-पत्रिका/ श्रीनारद संवाद सेवा




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